माघ मेला नोटिस के बाद फिर गरमाया ज्योतिषपीठ शंकराचार्य पद का पुराना विवाद

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प्रयागराज माघ मेला प्रशासन के नोटिस के बाद उत्तराखंड स्थित ज्योतिषपीठ बद्रीकाश्रम के शंकराचार्य पद को लेकर विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है। प्रशासन ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से सवाल किया है कि वे सार्वजनिक रूप से अपने नाम के आगे शंकराचार्य पद का उल्लेख किस आधार पर कर रहे हैं। इस नोटिस के बाद वर्षों पुराना विवाद फिर सामने आ गया है।
दरअसल ज्योतिषपीठ का विवाद नया नहीं है। आदि शंकराचार्य ने चारों पीठों के संचालन और उत्तराधिकार को लेकर स्पष्ट नियम तय किए थे और इसके लिए मठाम्नाय महानुशासनम् नामक ग्रंथ की रचना की थी। इसके बावजूद बद्रीकाश्रम स्थित इस पीठ पर लंबे समय तक शंकराचार्य पद को लेकर असमंजस और दावे चलते रहे।
उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ में स्थित ज्योतिषपीठ को उत्तराम्नाय मठ भी कहा जाता है। 18वीं शताब्दी में स्वामी रामकृष्ण तीर्थ के निधन के बाद यह पीठ लगभग 165 वर्षों तक निष्क्रिय रही। लंबे समय तक पद खाली रहने के कारण अलग अलग साधुओं और गुरुओं ने शंकराचार्य होने का दावा किया, जिससे विवाद गहराता चला गया और मामला अदालत तक भी पहुंचा।
स्थिति तब बदली जब 1941 में अन्य तीन पीठों के शंकराचार्यों की सहमति से स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य नियुक्त किया गया। वाराणसी स्थित भारत धर्म महामंडल के विद्वानों ने 11 मई 1941 को उनका चयन किया, जिसे पुरी और श्रृंगेरी पीठ के शंकराचार्यों का समर्थन भी मिला। इसके बाद गढ़वाल, वाराणसी और दरभंगा जैसे क्षेत्रों के धार्मिक संस्थानों ने भी इस नियुक्ति को मान्यता दी।
भविष्य में विवाद दोबारा न हो, इसके लिए 1941 में ही शंकराचार्य चयन की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया। इसके तहत संन्यासी होना, शास्त्रों का गहन ज्ञान, शुद्ध आचरण, शास्त्रार्थ में निपुणता, अन्य पीठों और काशी विद्वत परिषद की मान्यता जैसी शर्तें अनिवार्य की गईं।
मठाम्नाय महानुशासनम् को शंकराचार्य पीठों का संविधान माना जाता है। इसमें चारों पीठों की परंपरा, व्यवस्था और उत्तराधिकार से जुड़े नियमों का विस्तृत वर्णन है। आज भी शंकराचार्य पद से जुड़े सभी विवादों में इसी ग्रंथ और 1941 में तय किए गए नियमों को आधार माना जाता है।
