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पाकिस्तान का सिंध बना नीतिगत विफलता और उपेक्षा का उदाहरण: रिपोर्ट

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9 फ़रवरी 2026, 12:30 pm IST
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पाकिस्तान में 18वें संविधान संशोधन के बाद प्रांतों को पर्याप्त वित्तीय संसाधन और स्वायत्तता मिलने के बावजूद सिंध प्रांत नीतिगत विफलता और प्रशासनिक उपेक्षा का एक गंभीर उदाहरण बनकर उभरा है। यह बात एक नई रिपोर्ट में सामने आई है।


‘हाउसहोल्ड इंटीग्रेटेड इकोनॉमिक सर्वे 2024-25’ पाकिस्तान की दो अलग-अलग तस्वीरें पेश करता है- एक पाकिस्तान जो आगे बढ़ रहा है और दूसरा जो पीछे छूटता जा रहा है। यह रिपोर्ट एक्सप्रेस ट्रिब्यून के हवाले से प्रकाशित की गई है।


रिपोर्ट के अनुसार, सिंध में 14 प्रतिशत घरों में शौचालय की कोई सुविधा नहीं है, जो तथाकथित पिछड़े प्रांत बलूचिस्तान (12 प्रतिशत) से भी खराब स्थिति है। वहीं, पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा (केपी) में यह आंकड़ा लगभग 5 प्रतिशत है।


ग्रामीण सिंध में आज भी पीने के पानी के लिए हैंड पंप पर निर्भरता सबसे अधिक है। शिक्षा के क्षेत्र में भी सिंध और पंजाब के बीच 10 प्रतिशत का साक्षरता अंतर है। सिंध में लगभग 40 प्रतिशत स्कूली उम्र के बच्चे स्कूल में नामांकित नहीं हैं, और केवल दो-तिहाई बच्चों का ही पूर्ण टीकाकरण हो पाया है, जबकि पंजाब में यह आंकड़ा 79 प्रतिशत है।


रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि सिंध को अन्य प्रांतों की तरह राजनीतिक अस्थिरता का सामना नहीं करना पड़ता, क्योंकि पिछले चार चुनावों से एक ही पार्टी यहां स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में रही है। इसके बावजूद विकास के मोर्चे पर स्थिति बेहद कमजोर बनी हुई है।


रिपोर्ट में कहा गया है कि जब तक सभी प्रांतों में समान रूप से प्रगति नहीं होगी, तब तक वास्तविक राष्ट्रीय विकास संभव नहीं है।


इस बीच, लाहौर स्थित पत्रिका फ्राइडे टाइम्स में प्रकाशित एक हालिया लेख में कहा गया है कि मौजूदा समय की जरूरत है कि प्रांतों को स्वतंत्र रूप से पर्याप्त संसाधन जुटाने की अनुमति दी जाए, जिससे केंद्र सरकार के वित्तीय घाटे को भी कम किया जा सके।


लेख के अनुसार, संविधान के अनुच्छेद 161(1)(अ) और (ब) के तहत बलूचिस्तान को प्राकृतिक गैस पर उत्पाद शुल्क और खैबर पख्तूनख्वा को बिजली से होने वाली आय का शुद्ध लाभ मिलना चाहिए, लेकिन फिलहाल इसका क्रियान्वयन नहीं हो रहा है।


लेख में बताया गया है कि 7वें एनएफसी अवॉर्ड के तहत बिक्री कर में बलूचिस्तान और के-पी की हिस्सेदारी क्रमशः केवल 9 प्रतिशत और 15 प्रतिशत है। तेल, गैस और बिजली जैसे समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद कम जनसंख्या के कारण उन्हें राजस्व में बेहद कम हिस्सा मिलता है। सिंध भी इसी तरह की समस्या से जूझ रहा है।


18वें संशोधन के बाद संपत्ति कर, अचल संपत्ति पर पूंजीगत लाभ कर, उपहार कर और विरासत कर लगाने का अधिकार प्रांतों के पास है, लेकिन अमीर और प्रभावशाली वर्ग पर कर लगाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव केंद्र और प्रांतीय- दोनों स्तरों पर साफ नजर आता है।


--आईएएनएस

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