भोपाल/कान्हा। मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व में महज नौ दिनों के अंदर बाघिन टी141 और उसके चार शावकों के पूरे कुनबे की दुखद मौत से भारत की वन्यजीव संरक्षण व्यवस्था की नींव हिल गई है। शुरुआती जांच में इन मौतों की संभावित वजह 'कैनिन डिस्टेंपर वायरस' (सीडीवी) को माना जा रहा है। पशु चिकित्सक और वन्यजीव फोरेंसिक विशेषज्ञ इस जानलेवा संक्रमण के स्रोत की पुष्टि करने में जुटे हैं।

बाघिन टी141 और उसके चार शावकों की मौत ने संबंधित क्षेत्र में संभावित जैविक संकट को लेकर खतरे की घंटी बजा दी है, जिसे पारंपरिक रूप से देश के सबसे सुरक्षित बाघ आवासों में से एक माना जाता है।

रिपोर्टों और सूत्रों के अनुसार, ये दुखद घटनाएं 21 अप्रैल को तब शुरू हुईं, जब अमाही नाला क्षेत्र में पहला शावक मृत पाया गया। इसके कुछ ही समय बाद, 24 अप्रैल को एक दूसरा शावक भी सड़ी-गली अवस्था में मिला। वहीं, 26 अप्रैल तक तीसरा शावक भी एक रहस्यमयी बीमारी का शिकार हो गया, जिसके बाद उसकी मां और आखिरी जीवित बचे शावक को बचाने के लिए एक आपातकालीन बचाव अभियान शुरू किया गया।

इसके बाद, 27 अप्रैल को गंभीर रूप से बीमार बाघिन टी141 और उसके आखिरी शावक को गहन देखभाल के लिए मुक्की क्वारंटाइन सेंटर में ले जाया गया। हालांकि, 28 अप्रैल को उम्मीद की एक हल्की किरण दिखी, जब दोनों में सुधार के संकेत मिले और उन्होंने खाना-पीना शुरू कर दिया, लेकिन मंगलवार रात को स्थिति ने एक दुखद मोड़ ले लिया। उनकी हालत तेजी से बिगड़ी, जिसके चलते बुधवार सुबह बाघिन की मौत हो गई और आखिरकार उसके आखिरी शावक को भी खोना पड़ा।

शुरुआती जांच से यह पता चला है कि पूरे परिवार के खत्म होने की संभावित वजह खतरनाक 'कैनाइन डिस्टेंपर वायरस' हो सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, कैनाइन डिस्टेंपर वायरस एक ऐसा रोगजनक है, जिसे बाघों की आबादी के लिए सबसे खतरनाक वायरल खतरों में से एक माना जाता है, क्योंकि यह बहुत तेजी से फैलता है और इससे मृत्यु दर भी बहुत ज्यादा होती है।

फिलहाल एक विस्तृत जांच चल रही है। पशु चिकित्सक और वन्यजीव फोरेंसिक विशेषज्ञ इस संक्रमण के फैलने के स्रोत की पुष्टि करने में जुटे हुए हैं।

तीसरे शावक के शव को जबलपुर स्थित 'स्कूल ऑफ वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक एंड हेल्थ' भेज दिया गया है, जबकि बाघिन और जीवित बचे आखिरी शावक के खून और ऊतक के नमूनों का विश्लेषण विशेष प्रयोगशालाओं में किया जा रहा है।

सरही रेंज से पूरे बाघ परिवार का इस तरह खत्म हो जाना, उन अंतर्निहित कमजोरियों की एक कड़वी याद दिलाता है, जिनका सामना संक्रामक रोगों के खिलाफ लड़ाई में सबसे प्रतिष्ठित वन्यजीव अभयारण्यों को भी करना पड़ता है।