नई दिल्ली, 13 मई । भारत और उज्बेकिस्तान ने बुधवार को नई दिल्ली में विदेश कार्यालय परामर्श के 17वें दौर की बैठक की। इस बैठक में दोनों देशों के बीच रिश्तों पर चर्चा हुई, जिसमें खास तौर पर व्यापार और निवेश, पर्यटन, टेक्नोलॉजी, इनोवेशन, ऊर्जा, शिक्षा और दूसरे क्षेत्रों में सहयोग पर फोकस किया गया।
दोनों पक्षों ने आपसी हितों के क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर भी चर्चा की।
विदेश मंत्रालय (एमईए) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर बताया, “भारत-उज्बेकिस्तान विदेश कार्यालय परामर्श का 17वां दौर 13 मई को नई दिल्ली में हुआ। इसकी सह-अध्यक्षता सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज और उज्बेकिस्तान के विदेश मामलों के प्रथम उप मंत्री बखरोमजोन अलोयेव ने की।”
उन्होंने कहा कि दोनों देशों ने अपने पूरे द्विपक्षीय संबंधों की समीक्षा की और व्यापार, निवेश, पर्यटन, टेक्नोलॉजी, इनोवेशन, ऊर्जा, शिक्षा, सांस्कृतिक सहयोग और कांसुलर मामलों पर खास ध्यान दिया। साथ ही दोनों ने क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर भी विचारों का आदान-प्रदान किया।
भारत-उज्बेकिस्तान के रिश्ते बहुत पुराने समय से ऐतिहासिक रूप से जुड़े रहे हैं। भारत उन पहले देशों में शामिल था, जिन्होंने उज्बेकिस्तान की आजादी के बाद उसकी संप्रभुता को मान्यता दी थी। दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंध स्थापित करने का प्रोटोकॉल 1992 में ताशकंद में साइन हुआ था। भारत-उज्बेकिस्तान ने 2011 में अपनी साझेदारी को 'रणनीतिक साझेदारी' का दर्जा दिया।
इससे पहले दिन में, उज्बेकिस्तान के प्रथम उप विदेश मंत्री बखरोमजोन अलोयेव नई दिल्ली पहुंचे ताकि वे ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में शामिल हो सकें, जिसकी मेजबानी भारत कर रहा है।
एमईए ने 'एक्स' पर लिखा, “उप विदेश मंत्री बखरोमजोन जोराबोयेविच अलोयेव का नई दिल्ली आगमन पर गर्मजोशी से स्वागत है, वे ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में शामिल होने आए हैं।”
विदेश मंत्री एस. जयशंकर 14-15 मई को होने वाली ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक की अध्यक्षता करेंगे। एमईए ने मंगलवार को यह जानकारी दी थी।
भारत 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है, जिसकी थीम है ‘बिल्डिंंग फॉर रेसिलिएंस, इनोवेशन, कोआपरेशन और सस्टेनेबिलिटी’। यह थीम एक ऐसे दृष्टिकोण को दिखाती है जो लोगों और मानवता को केंद्र में रखता है, जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2025 में रियो डी जेनेरियो में हुए 17वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में कहा था।

