नई दिल्ली। भीष्म साहनी का जन्म 8 अगस्त 1915 को अविभाजित पंजाब के छावनी शहर रावलपिंडी में हुआ था। उनका परिवार मूल रूप से भेरा का रहने वाला था, जहां आज भी उनके पुरखों की विरासत के रूप में 'साहनी क्वार्टर' मौजूद हैं। वे रावलपिंडी के एक बेहद जीवंत और बहुसांस्कृतिक समाज में बड़े हुए, जहां वे अपने मुस्लिम दोस्तों के साथ हॉकी खेला करते थे। ग्यारहवीं कक्षा में ही उनकी पहली कहानी 'आबला' प्रकाशित हो चुकी थी।
अपने बड़े भाई और प्रसिद्ध अभिनेता बलराज साहनी को रोल मॉडल मानते हुए, भीष्म ने गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से अंग्रेजी साहित्य में एमए की डिग्री प्राप्त की। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने कुछ समय के लिए अपने पिता के व्यापार में हाथ बंटाया।
देश के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता अटूट थी। वे वर्ष 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान जेल भी गए। विभाजन के समय वे कांग्रेस के सक्रिय सदस्य थे और मार्च 1947 में रावलपिंडी में दंगे भड़कने पर उन्होंने शरणार्थियों के लिए राहत कार्य का बखूबी संचालन किया था। बाद में अपने भाई के प्रभाव में वे भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) में शामिल हो गए। 'इप्टा' के मंच ने उनके भीतर के वामपंथी विचारों को सुदृढ़ किया, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने कांग्रेस छोड़कर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली।
आजीविका के लिए उन्होंने अंबाला और खालसा कॉलेज, अमृतसर में अध्यापन किया और बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन कॉलेज में अंग्रेजी के व्याख्याता नियुक्त हुए। वर्ष 1957 से 1963 के बीच उनका जीवन मॉस्को में बीता, जहां उन्होंने 'विदेशी भाषा प्रकाशन गृह' में बतौर अनुवादक काम करते हुए लियो टॉल्स्टॉय के कालजयी उपन्यास 'पुनरुत्थान' सहित लगभग दो दर्जन रूसी कृतियों का हिंदी में अनुवाद किया। भारत लौटकर उन्होंने प्रसिद्ध पत्रिका 'नयी कहानियां' का संपादन संभाला और प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव के रूप में अपनी सेवाएं दीं। उन्होंने सफदर हाशमी की शहादत के बाद सांस्कृतिक एकजुटता के लिए 'सहमत' नामक संस्था की स्थापना भी की।
भीष्म साहनी का उपन्यास 'तमस' (1973) सांप्रदायिक पागलपन और इंसानी लाचारी का ऐसा जीवंत महाकाव्य है जो समाज की अंतरात्मा को झकझोर देता है। इसके साथ ही, उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानी 'अमृतसर आ गया है' ट्रेन के भीतर बैठे यात्रियों के बदलते व्यवहार के माध्यम से यह दिखाती है कि किस प्रकार सांप्रदायिक उन्माद इंसानों को हैवान बना देता है। उनका एक अन्य उपन्यास 'मय्यादास की माड़ी' पंजाब में सिख साम्राज्य के पतन और ब्रिटिश शासन के उदय के समय बिखरते सामाजिक मूल्यों का ऐतिहासिक दस्तावेज प्रस्तुत करता है। उनके लिखे नाटक 'हानूश' (1977), 'कबीरा खड़ा बाजार में' (1981) और 'माधवी' (1982) आज भी भारतीय रंगमंच के मार्गदर्शक स्तंभ हैं।
भीष्म साहनी ने 1957 से 1963 तक मॉस्को में रहकर रूसी क्लासिक्स का हिंदी में अनुवाद किया। 1958 में पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। वे 1975 में उपन्यास 'तमस' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1981 में लोटस लिटरेचर प्राइज, 1998 में पद्म भूषण तथा 2002 में साहित्य अकादमी फेलोशिप से सम्मानित हुए। दिल्ली में 11 जुलाई 2003 को उन्होंने अंतिम सांस ली।




