बेंगलुरु, 13 मई । कर्नाटक सरकार ने बुधवार को स्कूल और कॉलेज के यूनिफॉर्म संबंधी अपने 5 फरवरी 2022 के आदेश वापस ले लिए और नए दिशानिर्देश जारी किए। राज्य भर के शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों को निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ 'सीमित पारंपरिक और धार्मिक प्रतीक' पहनने की अनुमति सरकार ने दी है।यह निर्णय 24 अप्रैल की उस घटना के कुछ सप्ताह बाद आया है, जिसमें एक स्कूल में कथित तौर पर एक छात्रा का जनेऊ काट दिया गया था और कॉमन एंट्रेंस टेस्ट (सीईटी) के दौरान एक छात्रा का हिजाब हटा दिया गया था। इस घटना ने जनता में आक्रोश पैदा किया और राज्य में कक्षाओं में धार्मिक प्रतीकों को लेकर बहस को फिर से शुरू कर दिया।
कर्नाटक के स्कूल शिक्षा और साक्षरता मंत्री मधु बंगारप्पा ने कहा कि राज्य सरकार ने मुख्यमंत्री सिद्दारमैया के निर्देशों का पालन किया है, जिन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सभी धर्मों और आस्थाओं का सम्मान किया जाना चाहिए और छात्रों को स्कूल जाते समय तनाव का सामना नहीं करना चाहिए।
मंत्री बंगारप्पा ने आगे कहा, "इस संबंध में जारी सरकारी आदेश में विशेष रूप से पगड़ी, जनेऊ, शिव माला, रुद्राक्ष, हिजाब और इसी तरह के आमतौर पर पहने जाने वाले धार्मिक प्रतीकों को अनुमति दी गई है। हालांकि, ऐसे प्रतीक छात्रों के अनुशासन, सुरक्षा या पहचान में बाधा नहीं डालने चाहिए।"
उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा, "बच्चे शिक्षा के लिए ही स्कूल आते हैं और हमें उन्हें वह शिक्षा प्रदान करनी है। वे अपनी धार्मिक परंपराओं के साथ आते हैं। आज से इसके लिए विशिष्ट नियम लागू होंगे।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा हाल ही में पाठ्यपुस्तकों में किए गए संशोधन बच्चों के लाभ के लिए थे और किसी विशेष समुदाय के विरुद्ध नहीं थे।
स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग की अवर सचिव एस.एन. पद्मिनी द्वारा जारी कार्यवाही के अनुसार, नए आदेश का उद्देश्य सभी स्कूलों और कॉलेजों में 'एकरूपता, समानता, धर्मनिरपेक्षता और समान शिक्षा' सुनिश्चित करना है।
कर्नाटक शिक्षा अधिनियम, 1983 की धारा 7 और 133(2) और कर्नाटक शैक्षणिक संस्थान नियम, 1995 के नियम 11 का हवाला देते हुए, राज्य सरकार ने 5 फरवरी 2022 के सरकारी आदेश को तत्काल प्रभाव से औपचारिक रूप से रद्द कर दिया है।
संशोधित दिशानिर्देशों के अनुसार, सभी सरकारी, सहायता-प्राप्त, और निजी स्कूलों के साथ-साथ विश्वविद्यालयों को सरकारी निर्देशों के अनुसार निर्धारित यूनिफॉर्म का पालन करना जारी रखना होगा।
साथ ही, अब छात्रों को यूनिफॉर्म के साथ 'सीमित पारंपरिक और रीति-रिवाजों पर आधारित प्रतीक' पहनने की अनुमति होगी, बशर्ते कि ये यूनिफॉर्म के मूल उद्देश्य को न तो बदलें और न ही उसे विफल करें।
राज्य सरकार ने यह भी निर्देश दिया है कि यूनिफॉर्म के साथ ऐसे धार्मिक प्रतीक पहनने के कारण किसी भी छात्र को शिक्षण संस्थानों, कक्षाओं, परीक्षा कक्षों या शैक्षणिक गतिविधियों में प्रवेश से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
सरकारी आदेश छात्रों को धार्मिक या पारंपरिक प्रतीक पहनने या हटाने के लिए बाध्य करने पर रोक लगाता है। हालांकि, राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय परीक्षाओं के लिए निर्धारित ड्रेस कोड परीक्षाओं के दौरान लागू रहेगा।
राज्य सरकार ने विद्यालय विकास एवं निगरानी समितियों (एसडीएमसी), महाविद्यालय विकास समितियों और संस्थानों के प्रमुखों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि नियमों को समान रूप से और बिना किसी भेदभाव के लागू किया जाए।
आदेश में कहा गया है कि संस्थानों को समाज सुधारक बसवन्ना के दर्शन से प्रेरित समावेशी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी छात्र को शिक्षा से वंचित न किया जाए।
नए सरकारी आदेश के विपरीत कोई भी संस्थागत परिपत्र, नियम या निर्देश अमान्य घोषित कर दिया गया है।
राज्य सरकार ने यह भी कहा कि उसने केंद्रीय विद्यालयों में अपनाई जाने वाली ड्रेस कोड संबंधी विनियमों की जांच की है और पाया है कि कुछ सीमित पारंपरिक या धार्मिक प्रतीकों पर प्रतिबंध लगाए बिना भी संस्थागत अनुशासन बनाए रखा जा सकता है।
आदेश में कहा गया है, "संवैधानिक अर्थ में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ व्यक्तिगत मान्यताओं का विरोध नहीं है। इसका अर्थ है सभी के लिए समान सम्मान, निष्पक्षता और गैर-भेदभावपूर्ण व्यवहार है।"
आदेश में आगे कहा गया है, "संस्थागत अनुशासन और समानता, गरिमा और शिक्षा के अधिकार जैसे संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।"
यह आदेश कर्नाटक भर में तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है।

