नई दिल्ली। चीन से आयात होने वाले डेकोर पेपर पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी की अवधि बढ़ाते हुए भारत सरकार ने घरेलू उद्योग को राहत दी है। वित्त मंत्रालय ने इस शुल्क को 26 मार्च 2027 तक जारी रखने का निर्णय लिया है, ताकि सस्ते आयात के कारण स्थानीय बाजार में पैदा होने वाले दबाव और रोजगार पर पड़ने वाले असर को कम किया जा सके।वित्त मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, यह एंटी-डंपिंग ड्यूटी पहले 26 दिसंबर 2026 तक लागू रहने वाली थी, लेकिन अब इसकी अवधि बढ़ाकर 26 मार्च 2027 तक कर दी गई है। गौरतलब है कि दिसंबर 2021 में राजस्व विभाग ने चीन से आयात होने वाले डेकोर पेपर पर 110 डॉलर प्रति टन से 542 डॉलर प्रति टन तक की एंटी-डंपिंग ड्यूटी 5 वर्षों के लिए लगाई थी। नई अधिसूचना में कहा गया है कि चीन से आयात या निर्यात किए जाने वाले डेकोर पेपर पर लागू एंटी-डंपिंग शुल्क को मार्च 2027 तक बढ़ाया जा रहा है। यह फैसला वाणिज्य मंत्रालय के महानिदेशालय व्यापार उपचार (डीजीटीआर) की सिफारिश के आधार पर लिया गया है। सरकार का कहना है कि अत्यधिक सस्ते आयात से घरेलू उत्पादकों को नुकसान होता है, क्योंकि इससे स्थानीय बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ता है और घरेलू उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित होती है। एक अलग अधिसूचना में वित्त मंत्रालय ने यह भी बताया कि ईरान, ओमान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से आयात होने वाले कैल्साइंड जिप्सम पाउडर पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी को भी 16 मार्च 2027 तक बढ़ा दिया गया है। कैल्साइंड जिप्सम पाउडर को आमतौर पर प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) कहा जाता है और इसका उपयोग निर्माण, फार्मास्युटिकल और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में व्यापक रूप से किया जाता है। इसके अलावा, सरकार ने चीन से आयात होने वाले नेचुरल माइका बेस्ड पर्ल इंडस्ट्रियल पिगमेंट्स पर भी एंटी-डंपिंग ड्यूटी को अगले वर्ष 25 फरवरी तक बढ़ाने का फैसला किया है। एंटी-डंपिंग ड्यूटी एक व्यापारिक सुरक्षा उपाय है, जिसे तब लागू किया जाता है जब किसी उत्पाद को घरेलू बाजार में उसकी सामान्य कीमत से कम मूल्य पर बेचा जाता है और इससे स्थानीय उद्योग को नुकसान पहुंचने की आशंका होती है। इसका उद्देश्य आयात पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना नहीं, बल्कि अनुचित मूल्य निर्धारण के प्रभाव को संतुलित करना होता है। डेकोर पेपर का उपयोग मुख्य रूप से फर्नीचर और इंटीरियर डेकोरेशन उद्योग में किया जाता है। इसका इस्तेमाल सजावटी लैमिनेट्स, फर्नीचर, कैबिनेट, फ्लोरिंग और अन्य आंतरिक सजावट उत्पादों में व्यापक रूप से होता है।
नई दिल्ली। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने पैकेज्ड खाद्य उत्पादों के लिए फ्रंट-ऑफ-पैक न्यूट्रिशन लेबलिंग (एफओपीएल) लागू करने का प्रस्ताव रखा है, जिसके तहत अधिक नमक, चीनी या वसा (फैट) वाले पैकेज्ड खाद्य पदार्थों के पैकेट के सामने स्पष्ट रूप से लाल रंग का चेतावनी चिन्ह (रेड वार्निंग लेबल) लगाना अनिवार्य किया जा सकता है।यह प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक हलफनामे के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। अदालत ने खाद्य नियामक और सरकार से फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल लागू करने की समयसीमा पर स्पष्ट जानकारी मांगी थी। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत यदि किसी पैकेज्ड खाद्य उत्पाद में निर्धारित सीमा से अधिक नमक, चीनी या वसा पाया जाता है, तो उसके पैकेट के सामने सफेद पृष्ठभूमि पर लाल हेक्सागन (षट्कोणीय) चेतावनी चिन्ह (वार्निंग लेबल) प्रदर्शित करना होगा। एफएसएसएआई का कहना है कि यह व्यवस्था उपभोक्ताओं को खरीदारी के समय उत्पाद की पोषण संबंधी जानकारी तुरंत और आसानी से समझने में मदद करेगी, जिससे वे अधिक जागरूक खाद्य विकल्प चुन सकेंगे। नियामक ने संकेत दिया है कि एफओपीएल को चरणबद्ध तरीके से लागू करने के बजाय एक ही चरण में लागू करने की योजना है। एफएसएसएआई के अनुसार, प्रस्तावित चेतावनी प्रारूप कुछ हद तक कनाडा में अपनाए गए मॉडल से प्रेरित है और इसका उद्देश्य उन पोषक तत्वों को उजागर करना है, जिनका अत्यधिक सेवन स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। प्रस्ताव के मुताबिक, यदि कोई उत्पाद केवल एक ही पोषक तत्व जैसे नमक, चीनी या वसा की निर्धारित सीमा से अधिक है, तब भी चेतावनी लेबल लगाना अनिवार्य होगा। ऐसी स्थिति में लाल हेक्सागन के भीतर संबंधित पोषक तत्व का नाम लिखा जाएगा। यदि किसी उत्पाद में दो या तीनों पोषक तत्व निर्धारित सीमा से अधिक पाए जाते हैं, तो सभी संबंधित पोषक तत्वों का उल्लेख एक ही चेतावनी चिन्ह के भीतर किया जाएगा। एफएसएसएआई ने स्पष्ट किया है कि यह नियम केवल उन उत्पादों तक सीमित नहीं होगा जिनमें एक से अधिक जोखिमकारी पोषक तत्व मौजूद हों। यदि कोई खाद्य पदार्थ किसी एक निर्धारित पोषक तत्व की सीमा भी पार करता है, तो वह इस चेतावनी प्रणाली के दायरे में आएगा। खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण का कहना है कि इस लेबलिंग व्यवस्था का उद्देश्य उपभोक्ताओं को पैकेज्ड खाद्य पदार्थों की पोषण प्रोफाइल के बारे में स्पष्ट, सरल और तुरंत समझ आने वाली जानकारी उपलब्ध कराना है। हालांकि नियमों को अंतिम रूप देने से पहले उद्योग जगत और आम जनता से व्यापक परामर्श किया जाएगा। एफएसएसएआई के अनुसार, परामर्श प्रक्रिया पूरी होने और खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम के तहत आवश्यक नियामकीय प्रक्रियाओं के बाद मसौदा नियमों को जारी और अंतिम रूप देने में करीब चार महीने का समय लग सकता है।
नई दिल्ली। देश के खाद्य नियामक भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने प्रमुख ई-कॉमर्स और क्विक-कॉमर्स कंपनियों अमेजन, स्विगी इंस्टामार्ट, बिगबास्केट, फ्लिपकार्ट इंडिया और जेप्टो के खिलाफ विभिन्न नियामकीय उल्लंघनों को लेकर दंडात्मक कार्रवाई शुरू की है। एफएसएसएआई के अनुसार, इन कंपनियों के प्लेटफॉर्म पर भ्रामक दावों वाले खाद्य उत्पादों के प्रचार-प्रसार और कुछ प्रतिबंधित खाद्य पदार्थों की ऑनलाइन बिक्री से जुड़े मामलों में कार्रवाई की जा रही है।एफएसएसएआई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर जानकारी देते हुए कहा कि ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर नियामकीय अनुपालन की जांच के दौरान कई अनियमितताएं सामने आई हैं। इनमें उत्पादों की गलत ब्रांडिंग, उपभोक्ताओं को भ्रमित करने वाले दावे और कुछ प्रतिबंधित अथवा विषैले खाद्य पदार्थों की बिक्री एवं प्रदर्शन जैसे मामले शामिल हैं। नियामक के अनुसार, हैपिलो प्रीमियम डेट बाइट्स - जेस्टी ऑरेंज से जुड़े कुछ दावे और उत्पाद संबंधी जानकारियां खाद्य मानकों के अनुरूप नहीं पाई गईं। इस मामले में अमेजन सेलर सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड, फ्लिपकार्ट इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, स्विगी इंस्टामार्ट प्राइवेट लिमिटेड, जेप्टो मार्केटप्लेस प्राइवेट लिमिटेड और बिगबास्केट की इनोवेटिव रिटेल कॉन्सेप्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई है। एफएसएसएआई का कहना है कि खाद्य उत्पादों की पैकेजिंग और ऑनलाइन विवरण में दी गई जानकारी उपभोक्ताओं को सही और पारदर्शी तरीके से उपलब्ध कराना जरूरी है, ताकि खरीदारी करते समय किसी प्रकार का भ्रम न हो। एफएसएसएआई ने मिल्की मिस्ट के कुछ उत्पादों से जुड़े दावों और सूचनाओं को भी नियामकीय मानकों के अनुरूप नहीं पाया। इनमें फ्रेस लो फैट क्रीम, फार्म फ्रेश दही और ग्रीक योगर्ट जैसे उत्पाद शामिल हैं। इस मामले में स्विगी इंस्टामार्ट और बिगबास्केट के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई है। नियामक यह जांच कर रहा है कि उत्पादों से जुड़े दावे और विज्ञापन खाद्य सुरक्षा एवं लेबलिंग नियमों का पालन करते हैं या नहीं। एफएसएसएआई ने ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर धतूरा के फल और बीजों की बिक्री एवं प्रदर्शन को लेकर भी गंभीर आपत्ति जताई है। नियामक के अनुसार, खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के प्रावधानों के तहत ऐसे उत्पादों की बिक्री से जुड़े नियमों का उल्लंघन पाया गया है। इस मामले में अमेजन सेलर सर्विसेज, स्विगी इंस्टामार्ट और बिगबास्केट समेत कुछ प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई है। एफएसएसएआई का कहना है कि उपभोक्ताओं की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और ऐसे उत्पादों की उपलब्धता को गंभीरता से लिया जा रहा है। हाल के महीनों में एफएसएसएआई ने ऑनलाइन खाद्य वितरण और किराना प्लेटफॉर्म्स की निगरानी बढ़ाई है। खाद्य सुरक्षा, लाइसेंसिंग, उत्पादों के भंडारण, हैंडलिंग और नियामकीय अनुपालन से जुड़े मामलों में जांच का दायरा लगातार बढ़ाया जा रहा है। इसके साथ ही विभिन्न राज्यों के खाद्य सुरक्षा विभाग भी डार्क स्टोर्स, गोदामों और वितरण केंद्रों का निरीक्षण तेज कर चुके हैं, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उपभोक्ताओं तक पहुंचने वाले खाद्य उत्पाद निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन करें। पिछले छह महीनों में एफएसएसएआई ने खाद्य कारोबार संचालकों (एफबीओ) और ई-कॉमर्स कंपनियों के खिलाफ कई प्रवर्तन कार्रवाइयां की हैं। नियामक लगातार उपभोक्ताओं को भी इन कार्रवाइयों की जानकारी दे रहा है, ताकि खाद्य सुरक्षा और जागरूकता को बढ़ावा मिल सके।
नई दिल्ली। सेबी यानी भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (एसईबीआई) की इस सप्ताह होने वाली बोर्ड बैठक में पूंजी बाजार से जुड़े करीब एक दर्जन महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर विचार किए जाने की संभावना है। इनमें पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज (पीएमएस) नियमों में व्यापक बदलाव, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के लिए बाजार पहुंच का विस्तार, सेटलमेंट नियमों की समीक्षा और मान्यता प्राप्त निवेशक ढांचे को मजबूत करने जैसे मुद्दे शामिल हैं।रिपोर्टों के अनुसार, सेबी पीएमएस ढांचे में बड़े बदलावों पर विचार कर सकता है, जिससे निवेश विकल्पों का दायरा बढ़ेगा और अनुपालन प्रक्रियाएं अधिक सरल हो सकती हैं। प्रस्तावित सुधारों के तहत पीएमएस प्रबंधकों को विदेशी प्रतिभूतियों में निवेश की अनुमति देने पर विचार किया जा रहा है। इसके तहत सूचीबद्ध विदेशी शेयरों और ऋण प्रतिभूतियों के अलावा ऐसे विदेशी म्यूचुअल फंडों में भी निवेश की अनुमति मिल सकती है, जो विदेशी इक्विटी, डेट और रीट्स में निवेश करते हैं। हालांकि ऐसे निवेश विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (एफईएमए), लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (एलआरएस) की सीमाओं और ग्राहकों की स्पष्ट सहमति के अधीन होंगे। सेबी उन प्रतिभूतियों में निवेश की अनुमति देने पर भी विचार कर रहा है जो अभी सूचीबद्ध नहीं हुई हैं लेकिन सूचीबद्ध होने की प्रक्रिया में हैं। इसके अलावा विवेकाधीन पीएमएस प्रबंधकों को ग्राहकों की कुल प्रबंधित परिसंपत्तियों (एयूएम) का 10 प्रतिशत तक निवेश-योग्य गैर-सूचीबद्ध ऋण प्रतिभूतियों में निवेश की छूट देने का प्रस्ताव भी चर्चा में है। प्रस्तावित सुधारों में डिमैट पोर्टेबिलिटी, डिजिटल प्रकटीकरण दस्तावेज, सरल रिपोर्टिंग व्यवस्था, डीलिंग रूम और योग्यता संबंधी नियमों में ढील तथा पावर ऑफ अटॉर्नी से जुड़े प्रावधानों को आसान बनाना भी शामिल है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के लिए भी कुछ अहम बदलाव प्रस्तावित हैं। रिपोर्टों के अनुसार, एफपीआई को भौतिक डिलीवरी वाले गैर-कृषि कमोडिटी डेरिवेटिव्स में भागीदारी की अनुमति दी जा सकती है। हालांकि उन्हें डिलीवरी अवधि शुरू होने से तीन दिन पहले अपनी पोजिशन बंद या रोलओवर करनी होगी। सेबी सेटलमेंट ढांचे की समीक्षा पर भी विचार कर सकता है। प्रस्ताव के अनुसार, सेटलमेंट राशि को प्रतिभूति कानूनों के तहत निर्धारित न्यूनतम दंड से जोड़ा जा सकता है। इसके अलावा 10 लाख रुपए तक के मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक सेटलमेंट व्यवस्था और आवेदन की समयसीमा 60 दिनों से बढ़ाकर 90 दिन करने का प्रस्ताव भी शामिल है। रिपोर्ट के अनुसार, बाजार में विज्ञापन मानकों (कॉमन एडवरटाइजिंग कोड) को एकरूप बनाने के लिए सेबी कॉमन एडवरटाइजिंग कोड पर भी विचार कर सकता है, जिसका उद्देश्य स्टॉक ब्रोकर, म्यूचुअल फंड, पोर्टफोलियो मैनेजर, निवेश सलाहकार, रिसर्च विश्लेषक और अन्य मध्यस्थों के लिए एक समान विज्ञापन मानक लागू करना है। इसके अलावा रीट्स (रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स) और इनविट्स (इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स) को डिपॉजिटरी रिसीट्स के माध्यम से विदेशी पूंजी जुटाने की अनुमति देने के प्रस्ताव पर भी चर्चा हो सकती है। इससे इन प्लेटफॉर्म्स के लिए वैश्विक निवेशकों तक पहुंच आसान होने की संभावना है।
नई दिल्ली। रक्षा मंत्रालय ने भारतीय वायुसेना (आईएएफ) की लंबी दूरी से सटीक हमला करने की क्षमता को मजबूत करने के लिए भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (बीडीएल) के साथ 810.79 करोड़ रुपए का एक महत्वपूर्ण अनुबंध किया है। इस समझौते के तहत वायुसेना के लिए 160 सैटेलाइट स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन्स (एसएटी-एसएएडब्ल्यू) और संबंधित उपकरणों की खरीद की जाएगी।रक्षा मंत्रालय के आधिकारिक बयान के अनुसार, यह खरीद 'बाय इंडियन-इंडिजिनसली डिजाइन्ड, डेवलप्ड एंड मैन्युफैक्चर्ड' श्रेणी के अंतर्गत की जा रही है। अनुबंध पर हस्ताक्षर रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की उपस्थिति में हुए। एसएटी-एसएएडब्ल्यू एक एयर-टू-ग्राउंड प्रिसिजन-गाइडेड ग्लाइड बम है, जिसे जगुआर, हॉक और सुखोई-30 एमकेआई जैसे लड़ाकू विमानों से दागा जा सकता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह दुश्मन के एयरफील्ड को काफी दूरी से निशाना बनाने में सक्षम है, जिससे लड़ाकू विमान दुश्मन की वायु रक्षा प्रणाली की सीमा में प्रवेश किए बिना हमला कर सकते हैं। यह प्रणाली रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा स्वदेशी रूप से डिजाइन और विकसित की गई है। मंत्रालय के अनुसार, इसमें लगभग 60 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है। साथ ही इनिशियल मेजरमेंट यूनिट, लॉन्ग इम्पैक्ट डिले फ्यूज और ट्विन स्टोर कैरियर जैसे उप-प्रणालियों का भी स्वदेशीकरण किया गया है, जिससे रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को और बढ़ावा मिलेगा। रक्षा मंत्रालय ने बताया कि एसएटी-एसएएडब्ल्यू की आपूर्ति 2027-28 और 2028-29 के दौरान की जाएगी। इसके शामिल होने से भारतीय वायुसेना की परिचालन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी और किसी भी संघर्ष की स्थिति में निर्बाध हवाई अभियान चलाने की क्षमता और मजबूत होगी। ये स्मार्ट ग्लाइड बम विशेष रूप से रनवे, टैक्सी ट्रैक, मजबूत बंकर, विमान हैंगर, रडार प्रतिष्ठान, ईंधन भंडारण केंद्र और संचार सुविधाओं जैसे महत्वपूर्ण सैन्य ढांचों को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किए गए हैं। इनका उद्देश्य संघर्ष के शुरुआती चरण में दुश्मन के एयरबेस को नुकसान पहुंचाकर उसकी हवाई शक्ति को कमजोर करना होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ग्लाइड बम पारंपरिक सामरिक मिसाइलों की तुलना में अपेक्षाकृत कम लागत वाले होते हैं, क्योंकि इनमें आगे बढ़ने के लिए अलग रॉकेट या जेट इंजन नहीं होता। यह लॉन्च करने वाले विमान की गति और एयरोडायनामिक ग्लाइड क्षमता का उपयोग कर लक्ष्य तक पहुंचते हैं। एसएटी-एसएएडब्ल्यू में उच्च-विस्फोटक, प्री-फ्रैगमेंटेड डीप-पेनेट्रेशन वारहेड लगाया गया है, जो एयरफील्ड अवसंरचना को अधिकतम नुकसान पहुंचाने में सक्षम है। इसके साथ सैटेलाइट आधारित नेविगेशन प्रणाली इसे उच्च स्तर की सटीकता प्रदान करती है।