Thursday, October 8, 2026

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विराट कोहली का महा-रिकॉर्ड: सचिन को पीछे छोड़ बने सबसे तेज 15 हजारी

विराट कोहली का महा-रिकॉर्ड: सचिन को पीछे छोड़ बने सबसे तेज 15 हजारी

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नेपाल-तिब्बत सीमा पर बाढ़ के बीच MP की बेटी 4 दिन से लापता: लगातार बज रही मोबाइल की घंटी, शिवराज सिंह चौहान ने मदद का दिया भरोसा

नेपाल-तिब्बत सीमा पर बाढ़ के बीच MP की बेटी 4 दिन से लापता: लगातार बज रही मोबाइल की घंटी, शिवराज सिंह चौहान ने मदद का दिया भरोसा

विदिशा। नेपाल-तिब्बत सीमा पर हाल ही में आई भीषण बाढ़ और प्राकृतिक आपदा के बीच मध्य प्रदेश के विदिशा से ताल्लुक रखने वाले बागरेचा परिवार की चिंताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। कनाडा के टोरंटो में कार्यरत 50 वर्षीय भारतीय मूल की सॉफ्टवेयर इंजीनियर स्वाति बागरेचा पिछले चार दिनों से लापता हैं और परिजनों का उनसे कोई सीधा संपर्क नहीं हो पा रहा है। हालांकि, उनके मोबाइल फोन पर लगातार घंटी बज रही है, जिससे परिजनों में उनके जीवित और सुरक्षित होने की उम्मीद बंधी हुई है। परिजनों के अनुसार, स्वाति बागरेचा आठ अगस्त को दिल्ली से ईशा फाउंडेशन के 77 सदस्यीय दल के साथ कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए रवाना हुई थीं। उनकी 14 वर्षीय बेटी अनुष्का इस यात्रा में शामिल नहीं हुई थी और मुंबई में अपनी बड़ी बहन के पास रह रही है। 26 अगस्त की सुबह करीब 9:00 बजे स्वाति से अंतिम बार बात हुई थी, जब वे आव्रजन (Immigration) संबंधी औपचारिकताओं के लिए नेपाल-तिब्बत सीमा पर मौजूद थीं। इसके तुरंत बाद नेपाल के रसुवा क्षेत्र में भोटेकोशी नदी में अचानक भीषण जलप्रलय आ गया, जिससे त्रिशूली और गंडक नदी प्रणालियों में भारी तबाही मची और स्वाति से संपर्क पूरी तरह टूट गया। स्वाति के भाई डॉ. प्रशांत बागरेचा ने बताया कि स्वाति का फोन लगातार बज रहा है, लेकिन कोई कॉल रिसीव नहीं कर रहा है। शुरुआती तकनीकी ट्रैकिंग और लोकेशन रिकॉर्ड से पता चलता है कि फोन चीन सीमा के नजदीकी क्षेत्र में सक्रिय है। चूंकि मोबाइल नंबर कनाडा (टोरंटो) में पंजीकृत है, इसलिए उसकी वास्तविक और पिनपॉइंट जीपीएस लोकेशन निकालने में तकनीकी कठिनाई आ रही है। स्थिति को देखते हुए परिवार ने नेपाल स्थित भारतीय और कनाडाई दूतावासों से संपर्क कर त्वरित तकनीकी सहायता और खोज अभियान चलाने की गुहार लगाई है। स्थानीय विधायक मुकेश टंडन द्वारा मामले को संज्ञान में लाए जाने के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पीड़ित परिवार से बातचीत कर ढांढस बंधाया। केंद्रीय मंत्री ने विदेश मंत्रालय और भारतीय दूतावास के वरिष्ठ अधिकारियों से समन्वय कर स्वाति बागरेचा की सुरक्षित खोजबीन और रेस्क्यू के लिए कूटनीतिक व प्रशासनिक स्तर पर प्रयास तेज करवा दिए हैं। आपदा के साए के बीच परिवार लगातार ईश्वर से स्वाति के सकुशल घर लौटने की प्रार्थना कर रहा है।

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चीन तिब्बत नेपाल बाढ़ त्रासदी को लेकर आपदा के वीडियो कर रहा डिलीट: रिपोर्ट

चीन तिब्बत नेपाल बाढ़ त्रासदी को लेकर आपदा के वीडियो कर रहा डिलीट: रिपोर्ट

नई दिल्ली। एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय दैनिक की रिपोर्ट के अनुसार, चीन 26 अगस्त को ग्लेशियर के टूटने के बाद तिब्बत में आई विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन से हुई तबाही को दिखाने वाले वीडियो डिलीट कर रहा है।द टाइम्स ऑफ इजरायल की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ग्लेशियर टूटने से ल्हेंडे खोला और फिर भोटे कोशी और त्रिशूली नदी प्रणालियों में कीचड़, चट्टान और पानी का एक बड़ा सैलाब आ गया, जिससे नेपाल-तिब्बत सीमा पर बड़े पैमाने पर तबाही हुई। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस आपदा में पहले ही कई लोग हताहत हो चुके हैं। 28 अगस्त तक नेपाल में 579 मौतें हुई थीं और लगभग 1,924 लोग अभी भी लापता हैं। चीनी पक्ष में, तिब्बत के ग्यिरोंग काउंटी में आधिकारिक तौर पर पांच मौतें और 558 लोगों के लापता होने की सूचना मिली थी, जिनमें 260 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। उत्तरी भारत में नदियों से दस शव भी बरामद किए गए थे। रविवार को नेपाल और तिब्बत में संयुक्त रूप से मरने वालों की संख्या 750 तक पहुंच गई थी और 3,000 से अधिक लोग लापता बताए जा रहे हैं। अकेले नेपाल में 734 मौतें और 2,498 लोग लापता हैं। हालांकि, रिपोर्ट में चीनी पक्ष पर विनाश के पैमाने को दिखाने वाले वीडियो को कथित तौर पर हटाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। टाइम्स ऑफ इजरायल के अनुसार, बाढ़ आने के कुछ घंटों के भीतर ही चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस आपदा के वीडियो प्रसारित होने लगे। सुरक्षा फुटेज में कीचड़ और मलबे की एक विशाल दीवार को ग्यिरोंग पोर्ट पर इमारतों पर गिरते हुए दिखाया गया, जबकि लोग अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस लोकेशन और फुटेज की बाद में अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने पुष्टि की। रिपोर्ट में भूटानी पत्रकार का हवाला दिया गया, जिसने चीनी प्लेटफॉर्म से बाढ़ के फुटेज हटाए जाने पर प्रकाश डाला और इस बात पर जोर दिया कि यह सामग्री राजनीतिक विरोध या सरकार विरोधी गतिविधि के बजाय आपदा का फुटेज था। पत्रकारों ने बताया कि चीनी पक्ष में फिल्माए गए नागरिक वीडियो डिलीट किए जा रहे थे, जबकि नेपाल के फुटेज व्यापक रूप से उपलब्ध रहे। रिपोर्ट में कहा गया है कि चीनी प्लेटफॉर्म पर जो कुछ बचा था, वह काफी हद तक आधिकारिक बयान था, जिसमें बचाव अभियानों, सरकारी बयानों और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के निर्देशों के बारे में जानकारी के साथ-साथ विनाश की सीमा के बारे में सीमित जानकारी शामिल थी। इसके उलट नेपाल में स्थिति अलग रही, जहां पत्रकारों को प्रभावित इलाकों में जाने, पीड़ितों से मिलने और तबाही की तस्वीरें व वीडियो सामने लाने की पूरी आजादी मिली। रिपोर्ट में तिब्बत में, खासकर संवेदनशील सीमावर्ती इलाकों में विदेशियों की पहुंच पर पाबंदी की ओर भी संकेत दिया गया। इसमें कहा गया कि सीमा पार जो हुआ उसकी तुलना में नेपाल में हुई तबाही को ज्यादा स्पष्ट रूप से देखा जा सका। इसमें आपदा के कारणों से जुड़े सवालों की भी जांच की गई। शुरुआती रिपोर्टों में कहा गया था कि भूकंप के कारण यह हिमस्खलन हुआ होगा। हालांकि, अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने शुरू में 4.4 तीव्रता की भूकंपीय घटना दर्ज की थी, लेकिन बाद में पता चला कि यह संकेत भूकंप के बजाय भूस्खलन से ही उत्पन्न हुआ था। रिपोर्ट में कहा गया, "सैटेलाइट तस्वीरों में ग्लेशियर और चट्टान का एक बड़ा हिस्सा टूटते हुए दिखा, जिसके बाद बर्फ और चट्टान का हिमस्खलन हुआ जिसने नदी को अस्थायी रूप से अवरुद्ध कर दिया और फिर प्राकृतिक बांध टूट गया। अभी भी जांच के लिए बहुत कुछ बाकी है।" रिपोर्ट में नेपाल में तिब्बती पक्ष से बहकर आए विस्फोटक उपकरणों और क्या निर्माण या सुरंग बनाने से जुड़े विस्फोटों ने इलाके को अस्थिर करने में भूमिका निभाई हो सकती है, इस पर उठे सवालों का भी जिक्र किया गया।" रिपोर्ट किए गए उपकरण क्या थे? वे कहां से आए? क्या वे निर्माण कार्य से जुड़े थे? क्या पहाड़ों में सुरंग बनाने या कटाई के लिए विस्फोटकों का इस्तेमाल किया जा रहा था? क्या उनका आपदा से कोई संबंध नहीं था? रिपोर्ट में कहा गया, "इन सवालों का जवाब देने के लिए जरूरी स्थितियां ही मौजूद नहीं हैं। तिब्बती पक्ष में पहुंच प्रतिबंधित है, विदेशी पत्रकारों को गंभीर पाबंदियों का सामना करना पड़ता है और चीनी प्लेटफॉर्म से नागरिक फुटेज हटाए जा रहे हैं। इसी तरह से सूचना का अभाव पैदा होता है।" रिपोर्ट का सुझाव है कि अगर बीजिंग चाहता है कि दुनिया आपदा के लिए किसी खास स्पष्टीकरण को स्वीकार करे, तो इसका जवाब सेंसरशिप नहीं बल्कि सबूत होना चाहिए। तिब्बत से निकलने वाली नदी प्रणाली वहीं खत्म नहीं होती। ल्हेंडे खोला भोटे कोशी में मिलती है, जो नेपाल की त्रिशूली में बहती है, और अंततः भारत में गंडक बन जाती है। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि प्राकृतिक आपदा से निपटने वाली सरकार को नागरिकों द्वारा रिकॉर्ड किए गए फुटेज से डरना नहीं चाहिए, बल्कि उसे संरक्षित करना चाहिए। इसमें कहा गया है कि पत्रकारों को नुकसान का आकलन करने की अनुमति दी जानी चाहिए, जबकि वैज्ञानिकों और स्वतंत्र विशेषज्ञों को इलाके तक पहुंच और सैटेलाइट इमेजरी, चश्मदीदों के बयानों और आधिकारिक बयानों की तुलना करने में सक्षम होना चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार, तिब्बत से उभर रहा पैटर्न 'प्रतिबंधित पहुंच, गायब होते फुटेज और भारी-भरकम आधिकारिक बयान' का है। इन घटनाक्रमों ने इस बात को लेकर चिंता बढ़ा दी है कि बाहरी दुनिया स्वतंत्र रूप से आपदा का कितना आकलन कर सकती है। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया कि मुद्दा केवल वीबो या डॉयिन जैसे प्लेटफॉर्म से अलग-अलग वीडियो हटाए जाने का नहीं है, बल्कि इसमें तर्क दिया गया कि चिंता एक ऐसी आपदा के ऐतिहासिक रिकॉर्ड को नियंत्रित करने के बारे में है जिसका असर तीन देशों तक फैला है।

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नेपाल में बाढ़ राहत अभियान की सबसे बड़ी चुनौती सुरंग में फंसे लोगों को बचाना : राजन भट्टराई

नेपाल में बाढ़ राहत अभियान की सबसे बड़ी चुनौती सुरंग में फंसे लोगों को बचाना : राजन भट्टराई

काठमांडू। नेपाल में भीषण बाढ़ और भूस्खलन के बाद राहत एवं बचाव अभियान जारी है। देश के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के विदेश नीति सलाहकार रहे राजन भट्टराई के मुताबिक बचाव अभियान दल के सामने सबसे बड़ी चुनौती सुरंग में फंसे लोगों को बचाना है। आईएएनएस से खास बातचीत में उन्होंने कहा कि रसुवा जिले में हाइड्रोपावर परियोजना की सुरंग में लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने की कोशिश की जा रही है। भट्टराई ने कहा, "त्रासदी के पांच दिन हो गए हैं। अभी भी बड़ी संख्या में लोगों के सुरंग के भीतर फंसे होने की आशंका है। ऐसे में उन्हें जीवित बाहर निकालना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई है। बचाव अभियान के सामने पहली चुनौती उन लोगों को सुरक्षित निकालना है, जिनके सुरंग के अंदर होने की आशंका है। सुरंग से उन्हें बाहर निकालना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।" भट्टराई के मुताबिक, नेपाल सरकार ने इस मुश्किल अभियान में मदद के लिए अपने पड़ोसी देशों भारत और चीन से भी विशेषज्ञों तथा अन्य आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है, ताकि सुरंग में फंसे लोगों को जीवित बाहर निकाला जा सके। उन्होंने आगे कहा, "दूसरी चुनौती रसुवा की है। बहुत लोग अभी भी वहां हैं, उनके पास घर नहीं है। कुछ तीर्थयात्री हैं। कल ही वो लोग वहां से निकल पाए क्योंकि आपदा के बाद सड़क मार्ग तबाह हो चुके थे। बागमती प्रशासन ने कुछ सड़कों का निर्माण कराया। इस वजह से करीब 2000 लोग वहां से निकल पाए।" अन्य चुनौतियों का जिक्र करते हुए उन्होंने आगे कहा, "मेरे सूत्रों ने बताया कि उच्च स्थानों पर गंभीर रूप से घायल हैं इसलिए वो निकल नहीं पा रहे हैं। हमारे पास हेलीकॉप्टर पर्याप्त नहीं है; ये भी एक चुनौती है। फिर शवों का निपटान, घायलों का उपचार, और लोगों को आश्रय देना प्रमुख चुनौतियां हैं।" राहत और बचाव अभियान की प्राथमिकताओं के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि प्राथमिकता लोगों की जान बचाना है। उन्होंने कहा कि जो लोग अभी भी सुरंग के अंदर, रासुवा जिले के जंगलों में या अन्य दुर्गम इलाकों में फंसे हैं, उन्हें खोजकर सुरक्षित निकालना जरूरी है। इसके साथ ही घायल लोगों को तत्काल बुनियादी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना भी बेहद जरूरी है। नेपाल में आपदा प्रबंधन और पूर्व चेतावनी व्यवस्था पर भट्टराई ने कहा, "हमारे पास इतनी मजबूत पूर्व चेतावनी प्रणाली नहीं है। जो प्रणाली थी, वह भी इस बार बाढ़ में बह गई। इस बार बाढ़ और नुकसान का पैमाना अकल्पनीय था। हमारे विशेषज्ञों ने भी पहले इस तरह की स्थिति का अनुमान नहीं लगाया था। चीनी और भारतीय विशेषज्ञ भी इस स्तर की आपदा की कल्पना नहीं कर सके थे।" उन्होंने कहा कि नेपाल, भारत और चीन के बीच आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में सहयोग को और मजबूत करने की जरूरत है, क्योंकि प्राकृतिक आपदाएं सीमाओं तक सीमित नहीं रहतीं। वहीं, आपदा के पांचवें दिन भी राहत और बचाव अभियान को लेकर संतोष व्यक्त नहीं किया जा सकता। भट्टराई ने कहा कि हजारों लोगों के अब भी लापता होने की आशंका है और यह पता लगाना एक बड़ी चुनौती है कि वे कहां हैं। भट्टराई ने कहा, "यह पांचवां दिन है, लेकिन हम यह नहीं कह सकते कि हम संतुष्ट हैं। अभी भी बड़ी संख्या में, हजारों लोग लापता हैं। किसी को पता नहीं है कि वे कहां हैं और उन्हें कैसे खोजा जाए। बड़ी संख्या में लोग बुनियादी जरूरतों से वंचित हैं। वे पांच दिनों से खुले आसमान के नीचे हैं और उनके पास जीवित रहने तथा वहां से आगे बढ़ने के लिए जरूरी चीजें नहीं हैं।" उन्होंने स्पष्ट किया कि मौजूदा परिस्थितियों में राहत और बचाव कार्य को पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

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नेपाल त्रासदी: पीड़ितों के रिश्तेदार ने सुनाई दुखद कहानी, बोले- पूरा परिवार बह गया, चचेरा भाई बाल-बाल बचा

नेपाल त्रासदी: पीड़ितों के रिश्तेदार ने सुनाई दुखद कहानी, बोले- पूरा परिवार बह गया, चचेरा भाई बाल-बाल बचा

काठमांडू। नेपाल में भयानक बाढ़ के बाद मरने वालों की संख्या बढ़ रही है और बचाव दल किसी की जान बचाने के लिए समय से होड़कर रहे हैं। इसी बीच, प्रभावित परिवार के एक रिश्तेदार ने बताया कि चार सदस्य अपने घर के साथ ही कुछ ही सेकेंड में बह गए, और उनका चचेरा भाई ही अकेला बचा।नुवाकोट जिले में, तुलाराम गुरमिर ने इस दुखद घटना के बारे में बताते हुए अपने चचेरे भाई को सांत्वना दी, जो परिवार का एकमात्र जीवित सदस्य है। उन्होंने आईएएनएस से ​​बात करते हुए कहा, "वह मेरी मौसी का बेटा है। उसका पूरा परिवार बह गया। परिवार में जो भी था, सब बह गए। उसकी मां, पिता, बहन, बहन का बेटा, सब बह गए। बस वह बाल-बाल बच गया, क्योंकि वह चाय पीने के लिए बाहर निकला था।" स्थानीय युवक ने आगे कहा, "जैसे ही उसने जमीन खिसकते (लैंडस्लाइड) देखा, वह परिवार को सचेत करने के लिए भागा, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। वह उन्हें बचा नहीं सका।" गुरमिर ने कहा कि उनका भाई बोलने की हालत में नहीं है। उन्होंने कहा, "उनके घर से लेकर रोजी-रोटी तक, परिवार से जुड़ी हर चीज बह गई है।" इस बीच, बाढ़ पीड़ितों के परिवार वाले काठमांडू में त्रिभुवन यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिसिन के महाराजगंज मेडिकल कैंपस के पोस्टमॉर्टम ब्लॉक में जमा हुए। अस्पताल के मुर्दाघर में पीड़ितों की जानकारी वाले पोस्टर लगाए गए थे और परिवार वाले अपडेट का इंतजार कर रहे थे। एक पीड़ित के परिवार वाले ने आईएएनएस से ​​बातचीत करते हुए कहा, "सुरक्षाकर्मियों ने हमें कुछ देर इंतजार करने के लिए कहा, और फिर हम शव की पहचान करके उसे अंतिम संस्कार की प्रक्रिया के लिए ले जाएंगे।" जनकपुर जिले से आए एक लापता आर्मी अफसर के भाई ने अस्पताल के मुर्दाघर के बाहर इंतजार करते हुए उनकी तस्वीर दिखाई। एक अन्य लापता व्यक्ति के रिश्तेदार ने आईएएनएस को बताया कि परिवार को कोई अंदाजा नहीं है कि वह जिंदा है या मर चुका है। उन्होंने कहा, "हमने आखिरी बार उससे (बुधवार को) सुबह लगभग 8:45 बजे बात की थी। उसके बाद कोई संपर्क नहीं हुआ। अभी तक कुछ भी पता नहीं चला है।" उन्होंने आगे कहा, "हम अभी भी (किसी अपडेट के बारे में जानने के लिए) कॉल कर रहे हैं, लेकिन कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है। वे (अधिकारी) कह रहे हैं कि वे (जानकारी जुटाने की) कोशिश कर रहे हैं। वह जिंदा हैं या नहीं, हमारे पास कोई संपर्क या जानकारी नहीं है।" इस बीच, नेपाल के नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी (एनडीआरआरएमए) ने बताया कि 26 अगस्त को आई भीषण बाढ़ में अब तक 734 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 2,498 लोग लापता हैं, जिनमें 589 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं।

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नेपाल में बाढ़ पीड़ितों के लिए आगे आया डब्ल्यूएचओ, जारी किए 1.5 लाख डॉलर

नेपाल में बाढ़ पीड़ितों के लिए आगे आया डब्ल्यूएचओ, जारी किए 1.5 लाख डॉलर

काठमांडू। नेपाल में आई भीषण बाढ़ को देश की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक बताया जा रहा है। इस मुश्किल घड़ी में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने मदद का हाथ बढ़ाया है। डब्ल्यूएचओ ने नेपाल में बाढ़ प्रभावित समुदायों की तत्काल स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करने के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्रीय स्वास्थ्य आपातकालीन कोष से 1 लाख 50 हजार डॉलर की आपातकालीन राशि जारी की है। डब्ल्यूएचओ के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्रीय कार्यालय के प्रभारी डॉ. नीलेश बुद्धा ने कहा, "आपातकालीन फंड तत्काल प्राथमिकताओं को पूरा करने में मदद करेगा। डब्ल्यूएचओ राहत और रिकवरी प्रयासों के जरिए नेपाल का समर्थन करने के लिए प्रतिबद्ध है।" बता दें कि 26 अगस्त को अचानक आई बाढ़ के कुछ घंटों के भीतर ही डब्ल्यूएचओ ने जरूरी मेडिकल सप्लाई भेज दी थी। इसमें एक इंटरएजेंसी इमरजेंसी हेल्थ किट भी शामिल थी, जो करीब 10 हजार लोगों की 3 महीने तक की स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा कर सकती है। इसके साथ ही बहुउद्देश्यीय टेंट भी भेजे गए थे। जरूरत को देखते हुए डब्ल्यूएचओ ने प्रभावित इलाकों के लिए सर्जिकल मास्क, ग्लव्स, हैंड सैनिटाइजर और अन्य मेडिकल सामान भी जुटाए हैं। सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, बाढ़ में अब तक 730 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, करीब 2500 लोग लापता हैं, 200 से ज्यादा लोग घायल हैं और 74 लोगों का इलाज चल रहा है। बागमती और गंडकी प्रांत के छह जिलों में बाढ़ ने सबसे ज्यादा तबाही मचाई है। यहां करीब 10 हजार परिवारों को तुरंत राहत की जरूरत है। बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ है और कई लोग बेघर हो गए हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं समेत जरूरी बुनियादी ढांचे को भी भारी नुकसान पहुंचा है। सबसे ज्यादा प्रभावित रसुवा जिले में चार स्वास्थ्य केंद्र पूरी तरह तबाह हो गए हैं और धादिंग में दो आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गए हैं। सड़कें टूटने से धादिंग और त्रिशूली के दो अस्पतालों तक पहुंचना मुश्किल हो गया है। डब्ल्यूएचओ, सरकार और अन्य सहयोगी संस्थाओं के साथ मिलकर स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करने और जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं को बनाए रखने पर काम कर रहा है। बाढ़ के बाद डूबने, चोट, डायरिया, सांस की बीमारी, पानी और खाने से होने वाली बीमारियों और मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। इसके साथ ही अपनों को खोने, घर और रोजगार छिनने से लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर पड़ रहा है।

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