नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने शुक्रवार को कहा कि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद देश में खरीफ सीजन के दौरान उर्वरकों की उपलब्धता पर्याप्त बनी रही। सरकार ने बताया कि उर्वरक आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित रखने और निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए आपूर्ति विविधीकरण, सामूहिक खरीद और मजबूत निगरानी तंत्र जैसे व्यापक कदम उठाए गए हैं।लोकसभा में केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने बताया कि सरकार ने भारतीय उर्वरक कंपनियों और विदेशी आपूर्तिकर्ताओं के बीच दीर्घकालिक व्यावसायिक समझौतों को बढ़ावा दिया है।

इसके अलावा विभिन्न देशों में स्थित भारतीय मिशनों के माध्यम से वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की पहचान की गई और उद्योग समूहों के जरिए अमोनिया तथा सल्फर जैसे कच्चे माल की सामूहिक खरीद को प्रोत्साहित किया गया, जिससे बेहतर कीमत और सौदेबाजी की क्षमता हासिल की जा सके।

उन्होंने बताया कि कृषि एवं किसान कल्याण विभाग राज्य सरकारों के साथ समन्वय स्थापित कर राज्यवार और माहवार उर्वरक जरूरतों का आकलन करता है। इसी आधार पर उर्वरक विभाग हर महीने आपूर्ति योजना जारी करता है, इंटीग्रेटेड फर्टिलाइजर मैनेजमेंट सिस्टम (आईएफएमएस) के माध्यम से उर्वरकों की आवाजाही पर लगातार नजर रखता है और नियमित साप्ताहिक वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए उपलब्धता की समीक्षा कर जरूरत पड़ने पर तुरंत सुधारात्मक कदम उठाता है।

रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अनुसार, पश्चिम एशिया संकट का सबसे अधिक असर अमोनिया, फॉस्फोरिक एसिड और सल्फर के आयात पर पड़ा, जबकि वैश्विक लॉजिस्टिक्स बाधित होने से पोटाश के आयात की लागत भी बढ़ गई।

सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, 1 अप्रैल 2026 से 19 जुलाई 2026 तक के खरीफ सीजन में यूरिया, डीएपी, एमओपी और एनपीकेएस उर्वरकों की उपलब्धता आवश्यकता से अधिक रही। इस अवधि में यूरिया की जरूरत 109.40 लाख मीट्रिक टन थी, जबकि इसकी उपलब्धता 163.78 लाख मीट्रिक टन रही। वहीं डीएपी की मांग 31.57 लाख मीट्रिक टन के मुकाबले 39.54 लाख मीट्रिक टन उपलब्ध रहा।

सरकार ने यह भी बताया कि आइसोप्रोपाइल अल्कोहल (आईपीए), अमोनिया और मेथनॉल जैसे कच्चे माल की अस्थायी कमी और कीमतों में बढ़ोतरी से निपटने के लिए पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के साथ समन्वय कर प्रोपिलीन का आवंटन कराया गया, ताकि इनकी उपलब्धता बेहतर हो सके।

इसके अलावा, सरकार ने दवा उद्योगों को अतिरिक्त अमोनिया की आपूर्ति सुनिश्चित कराई और मौजूदा कारोबारियों के साथ-साथ घरेलू निर्माताओं के सहयोग से मेथनॉल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत भी विकसित किए।