छतरपुर, विनोद मिश्रा। छतरपुर-पन्ना जिले में केन-बेतवा लिंक परियोजना के विरोध में आदिवासियों का आंदोलन अब बेहद उग्र और संवेदनशील हो गया है। केन नदी के किनारे हजारों की संख्या में विस्थापित ग्रामीण “न्याय दो या मौत दो” के नारे लगाते हुए भूख हड़ताल पर बैठे हैं। महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग चिता पर लेटकर, जल में अर्धनग्न होकर और सांकेतिक फांसी जैसे तरीकों से विरोध जता रहे हैं, जिससे हालात अत्यंत मार्मिक बन गए हैं।
आंदोलन के चलते कई गांवों में चूल्हे तक नहीं जले। महिलाएं अपने दुधमुंहे बच्चों के साथ धरने पर बैठी हैं, जहां भोजन और दूध तक की व्यवस्था नहीं है। प्रदर्शनकारी नमक-रोटी और काली चाय के सहारे आंदोलन जारी रखे हुए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि उनकी जल, जंगल और जमीन छीनी जा रही है, लेकिन बदले में न तो उचित मुआवजा दिया जा रहा है और न ही सम्मानजनक पुनर्वास की व्यवस्था की गई है। कई पात्र परिवारों के नाम सूची से बाहर होने और मुआवजा प्रक्रिया में भ्रष्टाचार के भी आरोप लगाए गए हैं।
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अमित भटनागर ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि आंदोलन को कमजोर करने के लिए पानी, चिकित्सा और राशन जैसी बुनियादी सुविधाओं में बाधा डाली जा रही है। वहीं प्रशासन का पक्ष है कि अधिकांश प्रभावितों को मुआवजा दिया जा चुका है और आंदोलन को अवैध बताते हुए धारा 163 के तहत कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।
आंदोलन ने नया मोड़ तब लिया जब प्रदर्शनकारियों ने “पंचतत्व सत्याग्रह” शुरू किया, जिसमें जल, मिट्टी, अग्नि, वायु और उपवास के माध्यम से विरोध दर्ज कराया गया। इसके बाद प्रशासन और आंदोलनकारियों के बीच हुई बैठक में पारदर्शी सर्वे, बाहरी अधिकारियों की तैनाती, 7 दिन में जांच रिपोर्ट, मुआवजा बढ़ाने पर विचार और नए गांव बसाने जैसे मुद्दों पर सहमति बनी।
हालांकि, इन आश्वासनों के बावजूद आंदोलन जारी है। आंदोलनकारियों का कहना है कि यह अब केवल मुआवजे का नहीं, बल्कि अस्तित्व और पहचान बचाने की लड़ाई बन चुकी है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि मांगें पूरी नहीं हुईं तो चिता और फांसी आंदोलन के साथ प्राण त्यागने तक का कदम उठाया जा सकता है।
इसी बीच आंदोलन के नेता अमित भटनागर के घर की नपती को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। उनके परिवार ने प्रशासन पर दबाव बनाने और आंदोलन को कुचलने की साजिश का आरोप लगाया है। परिवार ने निष्पक्ष जांच और सुरक्षा की मांग की है। इस घटनाक्रम ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
केन नदी के किनारे शुरू हुआ यह आंदोलन अब पूरे बुंदेलखंड में बड़े जनसंघर्ष का रूप ले चुका है। एक ओर प्रशासन नियमों का हवाला दे रहा है, वहीं दूसरी ओर हजारों आदिवासी अपने हक और पहचान की लड़ाई लड़ रहे हैं। अब देखना होगा कि यह टकराव बातचीत से सुलझता है या आंदोलन और उग्र रूप लेता है।

