नई दिल्ली। दिल्ली के कालकाजी मंदिर के पीठाधीश्वर सुरेंद्रनाथ अवधूत ने बताया कि इस वर्ष गुरु पूर्णिमा का पर्व 29 जुलाई को मनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह पर्व भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का महत्वपूर्ण अवसर है। इस दिन गुरु की पूजा-अर्चना कर उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया जाता है।सुरेंद्रनाथ अवधूत ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि आषाढ़ मास की पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा या गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। इस बार आषाढ़ मास की पूर्णिमा 29 जुलाई को पड़ रही है, इसलिए उसी दिन गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाएगा। यह दिन महर्षि वेदव्यास को समर्पित माना जाता है, जिन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध किया। गुरु के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि अध्यात्म के क्षेत्र में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। गुरु ही वह शक्ति हैं, जो व्यक्ति के जीवन से अज्ञान का अंधकार दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। गुरु की कृपा से ही मनुष्य को सही मार्ग का बोध होता है और जीवन का वास्तविक उद्देश्य समझ में आता है।

सुरेंद्रनाथ अवधूत ने कहा कि शास्त्रों में भी गुरु की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है। गुरु ही अज्ञान रूपी अंधकार को समाप्त कर ज्ञान की ज्योति प्रज्ज्वलित करते हैं। उन्होंने कहा कि साधना के मार्ग पर सफलता भी गुरु की कृपा के बिना संभव नहीं मानी गई है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा, "बिनु गुरु पन्थ न पाइये, भूले सोई जो भेट। गोरख सिद्ध होइ योगी सिद्ध होइ, जब जब गोरख सो भेट॥" उन्होंने बताया कि इस दोहे का भावार्थ है कि गुरु की कृपा के बिना साधना के मार्ग में सफलता प्राप्त नहीं होती और जीवन में आध्यात्मिक उन्नति संभव नहीं है।

गुरु पूर्णिमा के दिन किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के बारे में जानकारी देते हुए, उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने अपने गुरु से दीक्षा ली है, वे इस दिन विशेष रूप से अपने-अपने गुरुदेव का पूजन करते हैं। श्रद्धालु गुरु का ध्यान करते हुए उन्हें प्रणाम करते हैं और पंचोपचार अथवा षोडशोपचार विधि से उनका विधिवत पूजन करते हैं। उन्होंने आगे बताया कि उनके पीठ से जुड़े हुए और उनसे दीक्षा प्राप्त करने वाले श्रद्धालु भी गुरु पूर्णिमा के अवसर पर मंदिर पहुंचकर अपने गुरुदेव का पूजन करते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि गुरु के प्रति श्रद्धा, समर्पण और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के सम्मान का उत्सव है, जो गुरु-शिष्य संबंध को और अधिक मजबूत बनाता है।