रायगढ़/छत्तीसगढ़ (रोहित तिर्की) - धरमजयगढ़ स्थित पंजीयन कार्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि रजिस्ट्री कराने के लिए आने वाले आम लोगों के बीच स्टांप वेंडर के अलावा कुछ ऐसे लोग भी कार्यालय परिसर में लंबे समय तक टेबल-कुर्सी लगाकर बैठे रहते हैं, जिनकी कार्यालय में बैठने की वैध भूमिका स्पष्ट नहीं है। स्थानीय स्तर पर इन्हें कथित रूप से दलाल अथवा बिचौलिये के रूप में देखा जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि ये लोग शासकीय कर्मचारी या अधिकृत सेवा प्रदाता नहीं हैं, तो उन्हें रजिस्ट्री कार्यालय के भीतर नियमित रूप से बैठने की अनुमति किसने दी है? क्या इनके लिए कार्यालय स्तर पर कोई लिखित अनुमति, आदेश अथवा अधिकृत व्यवस्था है? यदि अनुमति दी गई है तो उसका आधार क्या है और क्या आम नागरिकों को भी इसकी जानकारी दी गई है?
कार्यालय परिसर में निजी टेबल-कुर्सी लगाने की अनुमति किस नियम के तहत?
पंजीयन कार्यालय कोई सामान्य निजी कार्यालय नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण शासकीय कार्यालय है, जहां जमीन, मकान और अन्य अचल संपत्तियों से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेजों का पंजीयन किया जाता है। ऐसे कार्यालय में दस्तावेज प्रस्तुत करने, उनकी जांच, पक्षकारों की पहचान, निष्पादन की पुष्टि तथा पंजीयन की पूरी प्रक्रिया निर्धारित कानूनी व्यवस्था के तहत होती है।
Registration Act, 1908 की धारा 68 के तहत रजिस्ट्रार को अपने जिले के अधीन सब-रजिस्ट्रार के काम पर पर्यवेक्षण और नियंत्रण का अधिकार है। वहीं धारा 69 महानिरीक्षक को पंजीयन कार्यालयों पर सामान्य अधीक्षण तथा अधिनियम के अनुरूप नियम बनाने की शक्ति देती है।
ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि धरमजयगढ़ पंजीयन कार्यालय में यदि कोई गैर-सरकारी व्यक्ति नियमित रूप से बैठकर दस्तावेजी कार्य, ग्राहक संपर्क अथवा रजिस्ट्री संबंधी सहायता करता है, तो उसकी अधिकृत स्थिति क्या है और उसके कार्यालय परिसर में बैठने की अनुमति किस आदेश के तहत है?
क्या हर व्यक्ति रजिस्ट्री कार्यालय में बैठ सकता है?
कानून में पंजीयन प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिकाएं निर्धारित हैं। इसके अलावा कुछ राज्यों में दस्तावेज लिखने वालों अथवा पंजीयन कार्यालय के आसपास ऐसे कार्य करने वाले व्यक्तियों के संबंध में अलग नियम बनाए जा सकते हैं। Registration Act में ऐसे व्यक्तियों के संबंध में नियम बनाने की व्यवस्था भी रही है, विशेषकर उन लोगों के संबंध में जो पंजीयन कार्यालय के परिसर में दस्तावेज लिखने के उद्देश्य से आते-जाते हैं।
इसलिए किसी व्यक्ति के केवल कार्यालय में मौजूद होने से उसे सीधे 'अवैध दलाल' कहना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि कोई व्यक्ति बिना किसी अधिकृत आदेश या लाइसेंस के सरकारी कार्यालय में स्थायी रूप से टेबल-कुर्सी लगाकर बैठता है और पंजीयन संबंधी काम करता है, तो उसकी अधिकृत स्थिति की जांच होना आवश्यक है।
स्टांप वेंडर और कथित बिचौलियों में अंतर भी स्पष्ट होना जरूरी
रजिस्ट्री कार्यालय में अधिकृत स्टांप वेंडर या अन्य अधिकृत सेवा प्रदाता की मौजूदगी और किसी अनधिकृत व्यक्ति की मौजूदगी एक समान नहीं मानी जा सकती। इसलिए प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कार्यालय परिसर में बैठने वाले प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका, लाइसेंस, अनुमति और विभागीय अधिकृत स्थिति क्या है।
यदि कोई व्यक्ति अधिकृत है तो उसका नाम, पद/भूमिका और अनुमति का आधार स्पष्ट होना चाहिए। यदि वह अधिकृत नहीं है, तो सरकारी कार्यालय के अंदर उसके नियमित बैठने की अनुमति की जांच की जानी चाहिए।
रजिस्ट्री प्रक्रिया में पारदर्शिता जरूरी
Registration Act, 1908 के तहत पंजीयन अधिकारी को दस्तावेजों के पंजीयन की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं। उदाहरण के लिए, दस्तावेज के निष्पादन और संबंधित व्यक्तियों की पहचान से जुड़े मामलों में पंजीयन अधिकारी की भूमिका महत्वपूर्ण है। कानून में पंजीयन अधिकारी को उपस्थित व्यक्ति की पहचान आदि की संतुष्टि के लिए जांच करने का अधिकार भी दिया गया है।
ऐसे में यदि किसी बाहरी व्यक्ति की कार्यालय के अंदर लगातार मौजूदगी रहती है और वह पक्षकारों के दस्तावेजों अथवा रजिस्ट्री प्रक्रिया में हस्तक्षेप करता है, तो यह जांच का विषय बन सकता है कि कहीं इससे सरकारी प्रक्रिया की पारदर्शिता और आम नागरिकों की स्वतंत्रता प्रभावित तो नहीं हो रही।
कहीं अतिरिक्त पैसे वसूलने का तो नहीं चल रहा खेल?
रजिस्ट्री कराने आने वाले ग्रामीण और आम नागरिकों को अक्सर दस्तावेजी प्रक्रिया की पूरी जानकारी नहीं होती। ऐसी स्थिति में यदि कोई व्यक्ति स्वयं को 'रजिस्ट्री का जानकार' बताकर पक्षकारों से काम कराने के नाम पर अतिरिक्त रकम लेता है, तो प्रशासन को इसकी भी जांच करनी चाहिए।
कानून के तहत पंजीयन शुल्क निर्धारित व्यवस्था के अनुसार देय होता है। Registration Act की धारा 78 में फीस तय करने तथा धारा 79 में फीस के प्रकाशन का प्रावधान है, जबकि धारा 80 पंजीयन दस्तावेज प्रस्तुत करते समय फीस के भुगतान से संबंधित है।
इसलिए आम नागरिकों को यह स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए कि शासन द्वारा निर्धारित शुल्क कितना है और किसी निजी व्यक्ति को भुगतान करना आवश्यक है या नहीं।
CCTV कैमरों की एक माह की रिकॉर्डिंग की जांच की मांग
मामले की वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए धरमजयगढ़ पंजीयन कार्यालय की कम से कम एक माह की CCTV फुटेज की जांच कराई जा सकती है।
जांच में यह देखा जा सकता है कि—
1).कार्यालय में कौन-कौन से बाहरी व्यक्ति नियमित रूप से बैठते हैं?
2).वे किस स्थान पर बैठते हैं?
3).क्या वे रोजाना कार्यालय समय में मौजूद रहते हैं?
4).क्या वे रजिस्ट्री कराने आए लोगों से संपर्क करते हैं?
5).क्या वे दस्तावेजों के लेन-देन में किसी प्रकार की भूमिका निभाते हैं?
6).क्या वे सरकारी कर्मचारियों के साथ लगातार कार्यालयीन गतिविधियों में दिखाई देते हैं?
7).क्या उनके पास कार्यालय में बैठने की कोई लिखित अनुमति है?
8).क्या किसी अधिकारी अथवा कर्मचारी की मौजूदगी में वे पक्षकारों से आर्थिक लेन-देन करते हैं?
CCTV की तारीख और समय के साथ जांच किए जाने पर वास्तविक स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकती है।
क्या रजिस्ट्रार ने लिखित अनुमति दी है?
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि यदि बाहरी व्यक्ति कार्यालय के अंदर नियमित रूप से टेबल-कुर्सी लगाकर बैठ रहे हैं तो—
क्या उन्हें सब-रजिस्ट्रार/रजिस्ट्रार की लिखित अनुमति प्राप्त है?
यदि हां, तो प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि अनुमति किस आदेश क्रमांक और किस तारीख को जारी की गई।
यदि ऐसी कोई अनुमति नहीं है, तो सरकारी कार्यालय परिसर में उनकी मौजूदगी पर जिम्मेदार अधिकारी को जवाब देना चाहिए कि उन्हें वहां बैठने से क्यों नहीं रोका गया।
कानून की गंभीरता भी समझना जरूरी
Registration Act में केवल कार्यालय व्यवस्था ही नहीं, बल्कि पंजीयन प्रक्रिया में गलत तरीके से दस्तावेज पंजीकृत करने, गलत विवरण दर्ज करने, झूठी पहचान अथवा गलत बयान देने जैसे मामलों में भी दंडात्मक प्रावधान हैं।
धारा 81 के तहत यदि संबंधित परिस्थितियों में कोई पंजीयन अधिकारी या उसके कार्यालय का कर्मचारी जानबूझकर गलत तरीके से दस्तावेज का endorsement, copying, translation या registration करता है और उससे किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने का आशय/ज्ञान जुड़ा हो, तो दंड का प्रावधान है। धारा 82 झूठे बयान, गलत प्रतियां/अनुवाद, गलत व्यक्ति बनकर पेश होने तथा abetment जैसे कृत्यों से संबंधित है।
इसलिए किसी भी प्रकार की अनियमितता की आशंका को केवल 'छोटी कार्यालयीन बात' मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
जांच हो तो इन बिंदुओं पर भी हो पड़ताल
यदि प्रशासन मामले की निष्पक्ष जांच कराता है तो केवल CCTV देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ—
1).कार्यालय में मौजूद सभी निजी व्यक्तियों की सूची तैयार की जाए।
2).उनके लाइसेंस/अधिकृत अनुमति की जांच की जाए।
3).कार्यालय परिसर में टेबल-कुर्सी लगाने की अनुमति का आदेश देखा जाए।
4).संबंधित अवधि के रजिस्ट्री दस्तावेजों और पक्षकारों से पूछताछ की जाए।
5).स्टांप और पंजीयन शुल्क की वसूली की प्रक्रिया की जांच की जाए।
6).किसी निजी व्यक्ति द्वारा अतिरिक्त रकम लिए जाने की शिकायतों की जांच की जाए।
7).कार्यालय में लगे CCTV की उपलब्ध रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखी जाए।
8).संबंधित अधिकारी और कर्मचारियों से लिखित जवाब लिया जाए।
9).यदि कोई अनियमितता मिले तो जिम्मेदारी तय की जाए।
प्रशासन से उठते सवाल
धरमजयगढ़ पंजीयन कार्यालय को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब अब संबंधित विभाग को देना चाहिए—
क्या कार्यालय परिसर में बाहरी व्यक्तियों को बैठने की अनुमति है?
यदि अनुमति है तो वह किस नियम और किस आदेश के तहत है?
क्या कार्यालय में बैठने वाले सभी व्यक्ति अधिकृत हैं?
क्या उनके पास वैध लाइसेंस या विभागीय अनुमति है?
क्या किसी निजी व्यक्ति को कार्यालय परिसर में स्थायी रूप से टेबल-कुर्सी लगाने की अनुमति दी गई है?
यदि नहीं, तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
क्या कार्यालय की CCTV फुटेज में इन लोगों की नियमित मौजूदगी दर्ज है?
क्या पिछले एक माह की CCTV फुटेज सुरक्षित रखकर इसकी जांच कराई जाएगी?
निष्पक्ष जांच से ही सामने आएगी सच्चाई
फिलहाल इन लोगों को सीधे 'दलाल' कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि उनकी वास्तविक अधिकृत स्थिति की पुष्टि संबंधित विभाग की जांच के बाद ही हो सकती है। लेकिन यदि सरकारी कार्यालय के अंदर अनधिकृत रूप से बाहरी लोगों की नियमित मौजूदगी की बात सही है, तो यह निश्चित रूप से प्रशासनिक जांच का विषय है।
Registration Act के तहत पंजीयन व्यवस्था में रजिस्ट्रार और महानिरीक्षक को निगरानी तथा नियंत्रण की जिम्मेदारी दी गई है। ऐसे में धरमजयगढ़ पंजीयन कार्यालय की व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवालों पर विभागीय स्तर से पारदर्शी जांच कराना और वास्तविक स्थिति जनता के सामने रखना जरूरी है।
अब देखना यह होगा कि संबंधित अधिकारी CCTV फुटेज की जांच कराते हैं या नहीं और यदि कार्यालय में निजी व्यक्तियों के बैठने की अनुमति है तो उसका लिखित आधार सार्वजनिक किया जाता है या नहीं।




