नई दिल्ली। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी सचिव एस. कृष्णन ने कहा कि भारत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के लिए एक संतुलित और सावधानीपूर्वक तैयार किया गया नियामक ढांचा विकसित कर रहा है, जिसका उद्देश्य आवश्यक सुरक्षा उपायों और नवाचार के बीच संतुलन बनाए रखना है। इसके लिए अमेरिका, यूरोपीय संघ (ईयू) और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों द्वारा अपनाए जा रहे विकसित होते नियामक दृष्टिकोणों का भी अध्ययन किया जा रहा है।दुनियाभर में एआई की क्षमताएं तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे में विभिन्न देशों की सरकारें शक्तिशाली एआई मॉडलों को विनियमित करने के तरीकों पर विचार कर रही हैं, ताकि तकनीकी प्रगति बाधित न हो।
भारत भी इसी के साथ इंडियाएआई मिशन के माध्यम से अपने एआई इकोसिस्टम का विस्तार कर रहा है, सार्वजनिक कंप्यूटिंग अवसंरचना को मजबूत बना रहा है और स्वदेशी एआई विकास को प्रोत्साहित कर रहा है।
एनडीटीवी प्रॉफिट से बातचीत में कृष्णन ने कहा कि अब वैश्विक स्तर पर इस बात पर सहमति बन रही है कि एआई को पूरी तरह बिना किसी नियमन के नहीं छोड़ा जा सकता।
उन्होंने कहा, "वैश्विक स्तर पर यह धारणा बन चुकी है कि एआई के लिए नियमन जरूरी है। पहले एआई नियमन का सबसे मुखर विरोध अमेरिका करता था, लेकिन अब वही कुछ अत्याधुनिक (फ्रंटियर) एआई मॉडलों तक पहुंच को नियंत्रित कर रहा है। इससे स्पष्ट है कि इस विषय पर सोच किस तरह बदली है।"
कृष्णन ने कहा कि भारत विभिन्न देशों और क्षेत्रों द्वारा अपनाए जा रहे एआई गवर्नेंस मॉडल का गहराई से अध्ययन कर रहा है, ताकि देश का नियामक ढांचा व्यावहारिक, संतुलित और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप बनाया जा सके।
उन्होंने कहा, "हमारी प्रतिक्रिया एक संतुलित और सोच-समझकर तैयार किए गए नियमों का समूह होनी चाहिए। एआई प्लेटफॉर्म के लिए आवश्यक सुरक्षा उपाय और गाइडलाइन होना जरूरी है, लेकिन साथ ही ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि नियम नवाचार को बाधित कर दें।"
उन्होंने स्वीकार किया कि एआई से संबंधित कानून बनाना आसान नहीं है, क्योंकि यह तकनीक बहुत तेजी से विकसित हो रही है।
उन्होंने कहा, "कानून को तकनीक की गति के साथ कदम मिलाकर चलना होगा। यह एक बेहद नाजुक संतुलन है और ऐसा ढांचा तैयार करना चुनौतीपूर्ण है। इसमें कुछ समय लगेगा।"
इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी सचिव ने बताया कि भारत एआई गवर्नेंस से जुड़े वैश्विक विमर्श में सक्रिय रूप से भाग ले रहा है। इसमें यूरोपीय संघ और अमेरिका के नेतृत्व वाली पैक्स सिलिका पहल के साथ बातचीत भी शामिल है, जहां एआई इन्फ्रास्ट्रक्चर , कंप्यूटिंग संसाधनों तक पहुंच और जिम्मेदार एआई विकास जैसे विषयों पर चर्चा हो रही है।
उन्होंने कहा, "हम इन मुद्दों पर काम कर रहे विभिन्न वैश्विक मंचों का हिस्सा हैं। हमने यूरोपीय संघ और पैक्स सिलिका सहित कई देशों और समूहों के साथ इस बात पर विचार-विमर्श किया है कि एआई का नियामक ढांचा कैसा होना चाहिए।"
सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि भारत न तो यूरोपीय संघ के व्यापक एआई एक्ट की हूबहू नकल करेगा और न ही अमेरिका द्वारा शुरुआती दौर में अपनाए गए अपेक्षाकृत हल्के नियामक मॉडल को अपनाएगा।
इसके बजाय, नीति-निर्माता ऐसा ढांचा तैयार करने पर काम कर रहे हैं जो अत्याधुनिक एआई मॉडलों से जुड़े संभावित जोखिमों का समाधान करे, साथ ही स्टार्टअप, अनुसंधान संस्थानों और नवाचार-आधारित उद्यमों के लिए पर्याप्त लचीलापन भी सुनिश्चित करे।




