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गोल्ड पर फिर भारत का कब्जा: आइची-नागोया 2026 में ईरान को 37-34 से हराकर भारतीय महिला कबड्डी टीम बनी चैंपियन।

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पितृ पक्ष से जुड़ी सभी खबरें

पितृपक्ष में मोक्षदायी नासिक और पंढरपुर, गोदावरी और चंद्रभागा तट पर पितरों को मिलती है शांति

पितृपक्ष में मोक्षदायी नासिक और पंढरपुर, गोदावरी और चंद्रभागा तट पर पितरों को मिलती है शांति

नई दिल्ली। पितृपक्ष में पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए देशभर में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किए जाते हैं। महाराष्ट्र के नासिक और पंढरपुर को भी पितृकर्म के लिए महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है। नासिक में गोदावरी नदी के तट और पंढरपुर में चंद्रभागा नदी के किनारे श्रद्धालु अपने पितरों के निमित्त स्नान, तर्पण, पिंडदान और अन्य धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।नासिक में बहने वाली गोदावरी को 'दक्षिण गंगा' के नाम से भी जाना जाता है। पितृपक्ष के दौरान गोदावरी के तट पर पितरों की संतुष्टि के लिए स्नान, तर्पण और पिंडदान किए जाते हैं। मान्यता है कि विधि-विधान से किए गए इन कर्मों से पितरों को शांति और तृप्ति मिलती है तथा परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। नासिक के पंचवटी क्षेत्र और गोदावरी तट स्थित रामकुंड को पितृ तर्पण के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां श्रद्धालु स्नान करने के बाद अपने पितरों के नाम-गोत्र से तर्पण करते हैं और पिंडदान व श्राद्ध कर्म करते हैं। पितृपक्ष के दौरान इन स्थानों पर देशभर से श्रद्धालुओं के पहुंचने की मान्यता है। नासिक के पास स्थित त्र्यंबकेश्वर को भी पितृकर्म के लिए विशेष महत्व दिया जाता है। यह क्षेत्र गोदावरी के उद्गम स्थल के रूप में धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां त्रिपिंडी श्राद्ध और नारायण नागबली जैसे धार्मिक अनुष्ठान किए जाने की परंपरा है। मान्यता है कि त्रिपिंडी श्राद्ध और पिंडदान से अतृप्त पितरों को तृप्ति और मुक्ति मिलती है। कुशावर्त कुंड को भी पितृ तर्पण के महत्वपूर्ण स्थलों में माना गया है। पितृपक्ष में श्रद्धालु स्नान, तर्पण और श्राद्ध कर्म कर अपने पूर्वजों की शांति की कामना करते हैं। गोदावरी के तट पर पितृ कर्म के दौरान श्रद्धालु पितरों के नाम-गोत्र से तर्पण के साथ ब्राह्मण भोजन और दान भी करते हैं। इन कर्मों से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार को उनका आशीर्वाद मिलता है। इसी तरह, महाराष्ट्र का पंढरपुर भगवान श्री विट्ठल और माता रुक्मिणी के प्रसिद्ध धाम के रूप में जाना जाता है। यहां से होकर बहने वाली भीमा नदी अपने अर्धचंद्राकार प्रवाह के कारण 'चंद्रभागा' के नाम से भी जानी जाती है। चंद्रभागा नदी का तट पितृकर्म के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। पितृपक्ष के दौरान श्रद्धालु चंद्रभागा नदी के घाट पर स्नान कर पितरों के लिए तर्पण और पिंडदान करते हैं। कहा जाता है कि यहां स्नान और विधि-विधान से किए गए पितृकर्म से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है। पंढरपुर में चंद्रभागा नदी के बीच स्थित विष्णुपद मंदिर भी पितृकर्म से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। यहां भगवान विष्णु के चरणों के निशान होने की मान्यता है। यहां श्रद्धालु पितरों के मोक्ष और शांति की कामना से पिंडदान और श्राद्ध कर्म करते हैं।

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पितृपक्ष : राजस्थान का चमत्कारी पितृ तीर्थ लोहार्गल, जहां सूर्यकुंड में प्राप्त होती है मुक्ति

पितृपक्ष : राजस्थान का चमत्कारी पितृ तीर्थ लोहार्गल, जहां सूर्यकुंड में प्राप्त होती है मुक्ति

लोहार्गल। अरावली की पहाड़ियों के बीच स्थित लोहार्गल यानी लोहागढ़ को राजस्थान के प्रमुख पितृ तीर्थों में माना जाता है। पितृपक्ष के दौरान देशभर से श्रद्धालु यहां अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करने पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यता है कि लोहार्गल के पवित्र सूर्यकुंड में अस्थि विसर्जन करने से अस्थियां जल में विलीन हो जाती हैं और मृतकों को मुक्ति प्राप्त होती है। पितृपक्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलता है। इस अवधि में देश के प्रमुख तीर्थ स्थलों पर पितरों के निमित्त धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। लोहार्गल में भी पितृ पक्ष शुरू होते ही श्रद्धालुओं की आवक बढ़ जाती है। लोहार्गल में मुख्य तीन पर्वतों से निकलने वाली सात धाराओं का धार्मिक महत्व बताया जाता है। यहां स्थित सूर्यकुंड को पितृ कर्म के लिए विशेष माना जाता है। यहां श्रद्धालु स्नान करने के बाद अपने पितरों के नाम-गोत्र से तर्पण और पिंडदान करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान सूर्य क्षेत्र में तर्पण और पिंडदान करने से पितृ आत्माओं को शांति और शक्ति प्राप्त होती है। इसी आस्था के कारण यहां देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग पहुंचते हैं। पौराणिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार, भगवान परशुराम ने लोहार्गल धाम में पितृ तर्पण के साथ प्रायश्चित यज्ञ किया था। मान्यता है कि यज्ञ के बाद उन्होंने यज्ञ वेदी की अग्नि को तीर्थ के जल से शांत किया और अपने पिता महर्षि जमदग्नि की पितृ आत्मा का तर्पण किया। इसी पौराणिक प्रसंग के कारण लोहार्गल में पितृ तर्पण, पिंडदान और दिवंगत लोगों की अस्थि प्रवाह की परंपरा को विशेष महत्व दिया जाता है। यहां के पीठाधीश्वर अवधेशाचार्य के अनुसार, लोहार्गल वह स्थान है जिसकी रक्षा स्वयं ब्रह्मा जी करते हैं और यहां किए गए श्राद्ध से मोक्ष की प्राप्ति की मान्यता है। लोहार्गल की धार्मिक मान्यताओं में पांडवों से जुड़ी कथा भी प्रमुख है। ग्रंथों के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद पांडव अपने स्वजनों की हत्या के पाप से दुखी थे। भगवान श्रीकृष्ण की सलाह पर वे विभिन्न तीर्थों की यात्रा कर रहे थे। मान्यता है कि श्रीकृष्ण ने उनसे कहा था कि जिस स्थान पर उनके अस्त्र-शस्त्र पानी में गल जाएंगे, वहीं उनका पाप मुक्ति का मनोरथ पूरा होगा। कहा जाता है कि जब पांडव लोहार्गल पहुंचे और सूर्यकुंड में स्नान किया तो अर्जुन का गांडीव धनुष और भीम की गदा सहित उनके अस्त्र-शस्त्र जल में गल गए। इसके बाद पांडवों को कौरवों के वध के पाप से मुक्ति मिली। इसी मान्यता के कारण इस स्थान का नाम लोहार्गल यानी 'जहां लोहा गल जाए' पड़ा बताया जाता है। लोहार्गल को दिवंगत लोगों की अस्थियों के विसर्जन के लिए भी महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है। मान्यता है कि सूर्यकुंड में अस्थियां विसर्जित करने से वे जल में विलीन हो जाती हैं और मृतक को मुक्ति मिलती है। पितृपक्ष में यहां बड़ी संख्या में लोग अपने दिवंगत परिजनों की अस्थियां लेकर पहुंचते हैं। लोहार्गल के आसपास कई प्राचीन धार्मिक स्थल भी बताए जाते हैं। यहां सूर्य मंदिर, वनखंडी जी मंदिर, प्राचीन शिव मंदिर, हनुमान मंदिर और पांडव गुफा स्थित हैं। कुंड के पास एक विशाल बावड़ी है, जिसे राजस्थान की बड़ी बावड़ियों में गिना जाता है। करीब चार सौ सीढ़ियां चढ़ने के बाद मालकेतुजी के दर्शन किए जाते हैं।

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पितृपक्ष में मोक्षदायी है महाराष्ट्र का मेघंकर तीर्थ, यहां श्राद्ध से पितरों को मिलती है मुक्ति

पितृपक्ष में मोक्षदायी है महाराष्ट्र का मेघंकर तीर्थ, यहां श्राद्ध से पितरों को मिलती है मुक्ति

मेघंकर। हिंदू धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के स्मरण और उनके निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने का विशेष समय माना जाता है। देश में कई ऐसे तीर्थ स्थल हैं, जहां पितृ कर्म करने का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। महाराष्ट्र के खामगांव के निकट स्थित मेघंकर तीर्थ भी इन्हीं प्रमुख पितृ तीर्थों में शामिल माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, यहां श्राद्ध और तर्पण करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और श्राद्ध किए जाने वाले व्यक्ति के पाप नष्ट हो जाते हैं।मेघंकर तीर्थ को भगवान जनार्दन का साक्षात स्वरूप माना जाता है। मान्यता है कि सृष्टि के आरंभ में जब ब्रह्माजी ने यज्ञ किया था, तब यज्ञ में इस्तेमाल होने वाले एक पात्र से इस नदी का उद्भव हुआ था। इसी पौराणिक मान्यता के कारण इस स्थान को अत्यंत पवित्र माना जाता है। पितृपक्ष के दौरान लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इन कर्मों से प्रसन्न होकर पितर अपनी संतानों को आशीर्वाद देते हैं। इसी वजह से पितृ पक्ष के दौरान देश के प्रमुख पितृ तीर्थों पर श्रद्धालु पहुंचते हैं। मेघंकर में भी पितृ पक्ष के दौरान बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने की मान्यता है। यहां श्रद्धालु पवित्र नदी में स्नान करने के बाद अपने पितरों के निमित्त पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म करते हैं। इस तीर्थ को लेकर मान्यता है कि यहां श्राद्ध करने वाले व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। यहां तक कहा जाता है कि इस तीर्थ में श्राद्ध और तर्पण करने से पापियों को भी मुक्ति का मार्ग मिलता है। पितृपक्ष या अन्य विशेष अवसरों पर मेघंकर में स्नान, पिंडदान और श्राद्ध करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। हिंदू मान्यताओं में यह भी कहा जाता है कि मृत्यु के बाद आत्मा की मुक्ति के लिए पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध जैसे कर्म महत्वपूर्ण हैं। इन्हीं मान्यताओं के चलते मेघंकर को पितृ कर्म के लिए महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है। मेघंकर तीर्थ पैनगंगा नदी के तट पर स्थित है और महाराष्ट्र से लगभग 75 किलोमीटर की दूरी पर बताया गया है। यहां स्नान का भी विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। ब्रह्मपुराण और पद्मपुराण जैसे धर्मग्रंथों में भी श्राद्ध कर्म के लिए मेघंकर का उल्लेख होने की मान्यता बताई गई है। यह तीर्थ भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है और धार्मिक विश्वास है कि यहां श्राद्ध व तर्पण करने से पापों से मुक्ति तथा मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। पितृ पक्ष में मेघंकर पहुंचने वाले श्रद्धालु अपने दिवंगत परिजनों और पूर्वजों के निमित्त धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। उनका उद्देश्य पितरों की आत्मा की शांति और तृप्ति की कामना करना होता है। साथ ही, पितरों की संतुष्टि से परिवार को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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राजस्थान: पितृपक्ष में पुष्कर के 52 घाटों पर उमड़ते हैं श्रद्धालु, जानें श्राद्ध और पिंडदान का महत्व

राजस्थान: पितृपक्ष में पुष्कर के 52 घाटों पर उमड़ते हैं श्रद्धालु, जानें श्राद्ध और पिंडदान का महत्व

पुष्कर। ब्रह्माजी की नगरी और तीर्थ गुरु के रूप में प्रसिद्ध पुष्कर में पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। पुष्कर सरोवर के 52 घाटों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने पूर्वजों के निमित्त धार्मिक अनुष्ठान करने पहुंचते हैं। मान्यताओं के अनुसार, पुष्कर तीर्थ में पितरों के लिए किए गए श्राद्ध और पिंडदान से उन्हें तृप्ति, शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।हिंदू धर्म में 15 दिवसीय पितृ पक्ष को पितरों के स्मरण और उनके निमित्त तर्पण, पिंडदान और अन्य अनुष्ठान करने का समय माना जाता है। देश के कई तीर्थ स्थलों पर श्राद्ध कर्म किए जाते हैं, लेकिन पुष्कर को तीर्थ गुरु माना जाने के कारण यहां श्राद्ध और पिंडदान का विशेष महत्व बताया गया है। यही वजह है कि पितृ पक्ष में हजारों श्रद्धालु अपने पूर्वजों का श्राद्ध करने के लिए पुष्कर पहुंचते हैं। मान्यता है कि पितृ पक्ष या किसी विशेष अवसर पर पुष्कर में श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण करने से पितरों को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम ने वनवास के दौरान पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ पुष्कर पहुंचकर अपने पिता महाराज दशरथ का श्राद्ध और पिंडदान किया था। श्रीराम ने बालू और जल से पिंड बनाकर महाराज दशरथ का तर्पण और श्राद्ध किया। इसी पौराणिक प्रसंग के कारण पुष्कर सरोवर और इसके 52 घाटों पर पितृ कर्म करने की परंपरा को विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है। पुष्कर सरोवर के 52 घाट धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इनमें वराह घाट, ब्रह्मा घाट और गौ घाट प्रमुख हैं। श्रद्धालु इन घाटों पर स्नान, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक कर्म करते हैं। पुष्कर झील को लेकर अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं भी प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार, इसका पवित्र जल विष्णु की नाभि से निकला था, जबकि दूसरी कथा में कहा गया है कि ब्रह्मा द्वारा कमल का फूल गिराए जाने से पुष्कर सरोवर का अस्तित्व हुआ। इसी धार्मिक महत्व के कारण पुष्कर लंबे समय से हिंदू श्रद्धालुओं के प्रमुख तीर्थ स्थलों में शामिल माना जाता है। मान्यता के अनुसार, जन्म और पुनर्जन्म के कर्म चक्र से मुक्ति तथा दिवंगत प्रियजनों और पूर्वजों की आत्मा के कल्याण के लिए पिंडदान किया जाता है। अश्विन माह में पिंडदान का महत्व और अधिक माना गया है। पद्म पुराण में भी पुष्कर तीर्थ में किए गए श्राद्ध और पिंडदान को पितरों की तृप्ति और उन्हें उच्च लोक की प्राप्ति से जोड़ा गया है। इसी के चलते पितृ पक्ष में पुष्कर सरोवर के 52 घाटों पर देश के कोने-कोने से श्रद्धालु पहुंचकर अपने पूर्वजों के निमित्त तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करते हैं।

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बिहार : गयाजी में पितृपक्ष में दिख रहा आस्था के साथ सेवा का संकल्प भी, श्रद्धालुओं की थाली सजा रही ‘जीविका दीदी की रसोई’

बिहार : गयाजी में पितृपक्ष में दिख रहा आस्था के साथ सेवा का संकल्प भी, श्रद्धालुओं की थाली सजा रही ‘जीविका दीदी की रसोई’

गयाजी। पितरों के मोक्ष की कामना लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों से गयाजी पहुंच रहे श्रद्धालुओं के लिए इस बार आस्था के साथ सुविधाओं का भी विशेष ध्यान रखा जा रहा है। पितृपक्ष मेला 2026 के दौरान गांधी मैदान स्थित टेंट सिटी में संचालित ‘जीविका दीदी की रसोई’ श्रद्धालुओं के लिए किफायती, स्वच्छ और गुणवत्तापूर्ण भोजन का भरोसेमंद ठिकाना बनकर उभरी है। यहां आने वाले पिंडदानियों को उनकी धार्मिक आस्था और जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बिना प्याज और लहसुन का निरामिष भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है।गयाजी की पावन धरती पर पितृपक्ष के प्रथम दिन से ही बड़ी संख्या में पिंडदानियों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया है। फल्गु नदी के तट, विष्णुपद मंदिर और विभिन्न पिंडवेदी स्थलों पर तर्पण और पिंडदान के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ जुट रही है। दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए जिला प्रशासन की ओर से ठहरने और भोजन समेत विभिन्न व्यवस्थाएं की गई हैं। इसी क्रम में जीविका की दीदियों ने भी अपनी जिम्मेदारी संभाली है। संचालन कर रही एक जीविका दीदी बताती है कि गांधी मैदान स्थित टेंट सिटी में लगी ‘जीविका दीदी की रसोई’ में चावल-दाल-सब्जी की थाली, पूरी-सब्जी, रोटी-सब्जी और लिट्टी-चोखा महज 30 रुपये में उपलब्ध कराया जा रहा है। श्रद्धालुओं के लिए 40 रुपये में दही-चूड़ा, 60 रुपये में स्पेशल थाली और 10 रुपये में चाय उपलब्ध है। पेयजल की बोतलें भी 10 और 20 रुपये की दर से दी जा रही हैं। पितृपक्ष की धार्मिक परंपराओं को ध्यान में रखते हुए रसोई में तैयार भोजन में प्याज और लहसुन का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। दही-चूड़ा जैसे पारंपरिक और हल्के भोजन की उपलब्धता भी उन श्रद्धालुओं के लिए विशेष रूप से उपयोगी है, जो पिंडदान और तर्पण के दौरान सात्विक भोजन को प्राथमिकता देते हैं। इस रसोई का संचालन सहारा जीविका महिला स्वावलंबी सहकारी समिति, चंदौती के अंतर्गत किया जा रहा है। मेले के दौरान जीविका दीदियां अलग-अलग शिफ्ट में स्टॉल का संचालन कर रही हैं। श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के बीच भोजन तैयार करने से लेकर उसे परोसने तक की जिम्मेदारी दीदियां खुद संभाल रही हैं। ‘जीविका दीदी की रसोई’ सिर्फ भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था नहीं है, बल्कि गयाजी में ग्रामीण महिलाओं के आत्मनिर्भरता के संकल्प की तस्वीर भी पेश कर रही है। स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं अपने हुनर और मेहनत के बल पर न केवल आमदनी अर्जित कर रही हैं, बल्कि बड़े आयोजनों में जिम्मेदारी संभालकर अपनी क्षमता का प्रदर्शन भी कर रही हैं। गयाजी में पितृपक्ष का महत्व सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा से जुड़ा है। मान्यता है कि यहां फल्गु नदी के तट और विभिन्न वेदियों पर पिंडदान एवं तर्पण करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी आस्था के चलते हर वर्ष पितृपक्ष में देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु गयाधाम पहुंचते हैं। ऐसे में हजारों श्रद्धालुओं के लिए भोजन और अन्य बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता मेले की व्यवस्थाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है। इस वर्ष 25 सितंबर से 10 अक्टूबर तक चलने वाले पितृपक्ष मेले में ‘जीविका दीदी की रसोई’ श्रद्धालुओं को कम कीमत में भोजन उपलब्ध कराने के साथ महिला सशक्तीकरण का संदेश भी दे रही है। गयाजी की आध्यात्मिक धरती पर जहां श्रद्धालु अपने पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित कर रहे हैं, वहीं जीविका दीदियां अपनी मेहनत और आत्मविश्वास के जरिए आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रही हैं।

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