बालाघाट, रीतेश सोनी। मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य बालाघाट जिले के सघन वनांचल से एक बेहद मार्मिक और झकझोर देने वाली तस्वीर सामने आ रही है। जिन घने जंगलों और पहाड़ों को अपनी मातृभूमि मानकर बैगा-गोंड आदिवासियों की कई पीढ़ियां गुजरीं, अब उन्हें उन पुश्तैनी जमीनों को छोड़कर अन्यत्र बसना पड़ेगा। कभी लाल आतंक यानी नक्सलियों की दहशत, कभी पुलिसिया दबिश और तलाशी का खौफ, तो कभी सड़क, बिजली, पानी व अस्पताल जैसी बुनियादी सुविधाओं की घोर कमी से जूझने वाले इन वनग्रामों का अस्तित्व अब हमेशा के लिए खत्म होने की कगार पर है। प्रशासन द्वारा वनांचल के करीब आधा दर्जन से अधिक छोटे-बड़े वनग्रामों के विस्थापन की प्रक्रिया शुरू की गई है, जिसके चलते यह आशंका गहरा गई है कि जल्द ही ये गांव सरकारी नक्शे और राजस्व रिकॉर्ड से हमेशा के लिए विदा हो जाएंगे।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, विस्थापन की इस जद में मुख्य रूप से खारा, कोकमा, तल्लाबोडी, पोलबत्तूर और कुरथीटोला जैसे दूरदराज के वनग्राम शामिल हैं। इन गांवों को खाली कराने के एवज में प्रत्येक पात्र परिवार को 15-15 लाख रुपये का एकमुश्त मुआवजा दिए जाने की रूपरेखा सामने आई है। हालांकि, स्थानीय जानकारों और ग्रामीणों का मानना है कि यह मुआवजा कहीं से भी न्यायसंगत नहीं है। सदियों से इन जंगलों में बसे आदिवासियों की पुश्तैनी कृषि भूमि, बाड़ियां और प्राकृतिक संपदा का वास्तविक बाजार मूल्य करोड़ों रुपये में आंका जा सकता है, जिसका कभी निष्पक्ष और वैज्ञानिक मूल्यांकन ही नहीं हुआ। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी आम है कि इन पहाड़ियों और जंगलों के नीचे बहुमूल्य खनिज भंडार मौजूद हैं, जिसके कारण इस इलाके का महत्व और बढ़ जाता है।
विस्थापन की इस समूची प्रक्रिया में सबसे हृदयविदारक स्थिति बालाघाट के सबसे छोटे वनग्रामों में शुमार ग्राम कोकमा की है। सरकारी उपेक्षा और वर्षों के खौफ के चलते अधिकांश लोग पहले ही पलायन कर चुके हैं और वर्तमान में पूरे गांव में लगभग 15 सदस्यों वाला महज एक ही परिवार शेष बचा हुआ है। यदि इस अंतिम परिवार को भी यहां से हटा दिया गया, तो सदियों पुरानी समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराओं को समेटे इस पूरे गांव का नाम केवल इतिहास के पन्नों और गजेटियरों तक सीमित रह जाएगा।
नक्सल खौफ, दुर्गम रास्ते और बुनियादी सुविधाओं से हमेशा रहे वंचित
इन बीहड़ जंगलों में बसे वनग्रामों की जिंदगी कभी भी सुगम नहीं रही। भौगोलिक विषमताओं और पथरीले रास्तों के कारण ये गांव अपनी मूल ग्राम पंचायत और ब्लॉक मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर हैं, जबकि बैहर मुख्य मार्ग से इनकी दूरी लगभग 60 किलोमीटर बैठती है। इसी दुर्गमता की वजह से शासन की कल्याणकारी योजनाएं यहां तक कभी समय पर नहीं पहुंच सकीं। इसके अलावा, दशकों तक यह पूरा बेल्ट नक्सली गतिविधियों का केंद्र बना रहा। एक ओर नक्सलियों की बंदूकों की दहशत और दूसरी ओर सर्चिंग के दौरान सुरक्षा बलों के संदेह के बीच पिसते हुए ग्रामीणों ने अपनी जिंदगी काटी। जब जिला नक्सल-मुक्त घोषित हुआ, तब ग्रामीणों को उम्मीद बंधी थी कि अब उनके गांवों में सड़क, स्कूल और स्वास्थ्य जैसी विकास की नई सुबह होगी, लेकिन उसके बदले उन्हें विस्थापन का फरमान थमा दिया गया।
मिट्टी, देवस्थान और पुश्तैनी जड़ों से बिछड़ने का छलका दर्द
गांव खाली करने की खबरों के बीच स्थानीय ग्रामीणों, विशेषकर वनांचल की महिलाओं का दर्द छलक पड़ा है। ग्रामीणों का कहना है कि यह उनके लिए केवल जमीन का टुकड़ा छोड़कर जाना या नया मकान बनाना भर नहीं है, बल्कि अपनी उस पवित्र माटी से हमेशा के लिए अलग होना है जहां उनके पूर्वज दफन हैं, जहां उनका बचपन बीता और जहां उनके पारंपरिक 'बूढ़ादेव' व कुलदेवताओं के थान स्थापित हैं। जंगल और पहाड़ों पर निर्भर उनकी पारंपरिक जीवनशैली कंक्रीट के किसी कस्बे में जाकर कैसे बचेगी, यह चिंता हर बुजुर्ग और महिला के चेहरे पर साफ देखी जा सकती है।
बालाघाट के इन वीरान होते वनग्रामों की दास्तान विकास, सुरक्षा और मानवीय संवेदनाओं के बीच एक बड़ा सवाल छोड़ती है। क्या चंद लाख रुपयों का मुआवजा इन आदिवासी परिवारों के सदियों पुराने सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय रिश्तों की भरपाई कर पाएगा? क्या नई बस्तियों में उन्हें वास्तव में सम्मानजनक आजीविका, सुरक्षित आवास और बुनियादी सुविधाएं मिल पाएंगी? फिलहाल बेबसी के आलम में इन ग्रामीणों की टकटकी प्रशासन की ओर लगी है। वे चाहते हैं कि विस्थापन की किसी भी योजना को जबरन थोपने के बजाय उनकी पूर्ण सहमति, परंपराओं के संरक्षण और उनके भावी जीवन के स्थायित्व को प्राथमिकता दी जाए।














