मंडला | कान्हा राष्ट्रीय उद्यान को विश्व पटल पर स्थापित करने वाले और देश-दुनिया में इसकी अनूठी पहचान बनाने वाले वन्यजीव विशेषज्ञ हेमेंद्र सिंह पंवार का निधन हो गया है। उनके निधन की खबर फैलते ही मानो कान्हा की वादियों में सन्नाटा पसर गया। कान्हा टाइगर रिजर्व के सृजनकर्ता और पद्म विभूषण से सम्मानित स्वर्गीय पंवार को श्रद्धांजलि देने के लिए शनिवार को खटिया गेट के सामने गाइड, जिप्सी चालक और स्थानीय लोग एक कतार में खड़े हुए और मौन नमन किया। यह केवल एक श्रद्धांजलि सभा नहीं थी, बल्कि उस दूरदर्शी व्यक्तित्व के प्रति समूचे क्षेत्र की कृतज्ञता का भाव था।
1974 से 1981 के कार्यकाल में बदला कान्हा का भूगोल
हेमेंद्र सिंह पंवार वर्ष 1974 से 1981 तक कान्हा टाइगर रिजर्व के पद पर रहे। यह वह दौर था जब उन्होंने कान्हा के जंगलों को न सिर्फ संरक्षित किया, बल्कि उन्हें दुनिया के सामने प्रकृति संरक्षण के एक 'आदर्श मॉडल' के रूप में स्थापित किया। उनकी दूरदर्शिता और अथक प्रयासों का ही नतीजा है कि आज कान्हा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाघों और दुर्लभ बारहसिंघा के संरक्षण के लिए जाना जाता है। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन वन्यजीव संरक्षण, पर्यावरण संवर्धन और प्रकृति के प्रति जनजागरण को समर्पित कर दिया था।
हजारों परिवारों को दिया सम्मान और रोजगार
श्रद्धांजलि सभा के दौरान उपस्थित स्थानीय लोगों और कान्हा से जुड़े स्टाफ की आंखें नम थीं। लोगों ने उनके साथ बिताए पलों और उनके कार्यों को याद किया।
"पंवार साहब ने न केवल जंगल और वन्यजीवों की रक्षा की, बल्कि बस्तर और मंडला के इस वनांचल में रहने वाले हजारों गरीब परिवारों के जीवन में सम्मान और रोजगार की रोशनी पहुंचाई। उन्होंने स्थानीय आदिवासियों और युवाओं को गाइड व जिप्सी संचालन से जोड़कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया। आज कान्हा का हर परिवार उनका ऋणी है।"
- स्थानीय गाइड संघ, कान्हा
अंतिम विदाई: विरासत हमेशा रहेगी अमर
मौन के उन पलों में समूचा पर्यटन क्षेत्र गहरे शोक में डूबा नजर आया। स्थानीय लोगों का कहना है कि बाघों की गर्जना, बारहसिंघों की छलांग और जंगल की हर सांस में आज भी पंवार साहब के सपनों की गूंज सुनाई देती है। पेड़ों की सरसराहट और जंगल की हर पगडंडी मानो अपने सबसे बड़े संरक्षक को अंतिम प्रणाम कर रही है। क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों और वन्यजीव प्रेमियों ने भी उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा है कि पंवार साहब भले ही इस दुनिया से चले गए हों, लेकिन प्रकृति संरक्षण के क्षेत्र में उनकी विरासत सदैव जीवित रहेगी। शोकाकुल परिवार के प्रति पूरे मंडला जिले ने संवेदना व्यक्त की है।

