पिता की मौत हुई तो 6 साल के बेटे ने कहा- "तेरहवीं का भोज नहीं, निर्धन कन्या का विवाह कराऊंगा"

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नौगांव (कमल यादव)। बुंदेलखंड के छतरपुर जिले में नौगांव शहर से एक ऐसा वाक्या सामने आया है जिसने समाज की रूढ़िवादी बेड़ियों को झटके में तोड़ दिया। नगर के प्रतिष्ठित सर्राफा व्यवसायी स्वर्गीय गोपाल कठेल के निधन के बाद, उनके परिवार और मात्र 6 वर्षीय पुत्र कान्हा ने वह कर दिखाया जो बड़े-बड़े सूरमा नहीं कर पाते। परिवार ने स्पष्ट कह दिया कि हम मृत्यु भोज पर पैसा बहाने के बजाय किसी गरीब की बेटी के हाथ पीले करेंगे।
दुख के पहाड़ के बीच मानवता का उदय
लगभग 13 दिन पहले गोपाल कठेल का झांसी में हृदय गति रुकने से निधन हो गया था। घर में कोहराम मचा था, तीन बहनें और एक छोटा बेटा अपने पिता को खो चुके थे। शुक्रवार को उनकी तेरहवीं का कार्यक्रम था। आमतौर पर ऐसे मौकों पर भव्य भोज का आयोजन होता है, लेकिन स्वर्गीय गोपाल की बहन तृप्ति कठेल और मासूम बेटे कान्हा ने इस परंपरा को सिरे से नकार दिया। उन्होंने समाज को संदेश दिया कि किसी के जाने के बाद दिखावे के भोजन से बेहतर है किसी जीवित इंसान के जीवन में खुशियां लाना।
अनाथ लक्ष्मी का 'भाई' बना 6 साल का कान्हा
जिस घर से पिता की अर्थी उठी थी, उसी घर के आंगन में शुक्रवार को शहनाई गूंजी। 21 वर्षीय अनाथ लक्ष्मी अनुरागी, जिसके माता-पिता इस दुनिया में नहीं थे, उसका विवाह कठेल परिवार ने अपने खर्च पर कराया। 6 साल के मासूम कान्हा ने अपनी कोमल उम्र में पिता की तेरहवीं पर 'कन्यादान' का पुण्य कमाया। लक्ष्मी को विदा करते समय परिवार ने उसे लाड़ली बेटी की तरह करीब 40 प्रकार की गृहस्थी सामग्री भेंट की और उसके नाम 20 हजार रुपये की एफडी भी कराई। शादी के मंडप में एक तरफ पिता की तस्वीर थी और दूसरी तरफ अग्नि के फेरे लेती लक्ष्मी। यह दृश्य देख वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं।
कुप्रथा पर कड़ा प्रहार
कठेल परिवार की इस पहल ने पूरे जिले में चर्चा छेड़ दी है। परिवार का कहना है कि वे मुख्यमंत्री मोहन यादव के सामाजिक सुधार के संदेशों से प्रेरित हैं। उन्होंने समाज को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि मृत्यु भोज जैसी कुप्रथाओं में कर्ज लेकर पैसा बर्बाद करने से अच्छा है कि उस धन का उपयोग किसी जरूरतमंद की शिक्षा या शादी में किया जाए। स्वर्गीय गोपाल कठेल को यह नौगांव की सबसे सच्ची और भावुक श्रद्धांजलि थी, जहाँ एक तरफ गम के आंसू थे तो दूसरी तरफ एक बेसहारा बेटी के घर बसने की मुस्कान।
