संयुक्त राष्ट्र। अमेरिका और यूरोपीय संघ (ईयू) ने संयुक्त राष्ट्र के उस घोषणापत्र को खारिज कर दिया है, जिसका मकसद भविष्य में आने वाली महामारियों से निपटने के लिए दुनिया के देशों के बीच सहयोग को मजबूत करना है। हालांकि, भारत और जर्मनी ने दस्तावेज के कुछ हिस्सों पर चिंता जताई, लेकिन इसका विरोध नहीं किया। मीडिया रिपोर्टों में यह जानकारी दी गई है।इस घोषणापत्र पर शुक्रवार को न्यूयॉर्क में महामारी की रोकथाम, तैयारी और उससे निपटने पर संयुक्त राष्ट्र महासभा की दूसरी हाई-लेवल बैठक में विचार किया गया।

द न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, इटली ने भी इस दस्तावेज को साफ तौर पर खारिज कर दिया।

यह घोषणापत्र कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। यानी यह सरकारों को यह तय करके नहीं देगा कि किसी स्वास्थ्य संकट या महामारी के दौरान उन्हें किस तरह से कदम उठाने ही होंगे।

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत और जर्मनी ने घोषणापत्र के कुछ हिस्सों को लेकर आपत्ति जताई, लेकिन इसे खारिज नहीं किया। हालांकि, भारत ने खास तौर पर किन बातों पर आपत्ति जताई, इसकी जानकारी नहीं दी गई।

अब इस दस्तावेज को आगे विचार के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा के पास भेजे जाने की उम्मीद है।

अमेरिका ने कहा कि बातचीत के दौरान कई बदलाव किए जाने के बावजूद घोषणापत्र में अब भी कुछ ऐसी भाषा मौजूद है, जो उसे मंजूर नहीं है।

अमेरिकी सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) की डायरेक्टर एरिका श्वार्ट्ज ने कहा कि इसमें ऐसे 'विवाद पैदा करने वाले विचार शामिल हैं, जिनकी परिभाषा को लेकर भी आम सहमति नहीं है।'

द न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, श्वार्ट्ज ने कहा क‍ि अमेरिका इस पूरे दस्तावेज का समर्थन करने की स्थिति में नहीं है। ट्रंप प्रशासन ने बातचीत के दौरान घोषणापत्र में कई बदलाव करने की मांग की थी।

अखबार के मुताबिक, इसके पहले के ड्राफ्ट में बराबरी, एकजुटता, यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं, लैंगिक समानता, वैक्सीन तक पहुंच और अंतरराष्ट्रीय फंडिंग जैसे मुद्दों का जिक्र था। वॉशिंगटन ने इनमें से कुछ बातों को हटाने की मांग की थी।

यूरोपीय संघ ने दूसरी तरह की चिंताएं जाहिर कीं। उसकी आपत्तियां मुख्य रूप से बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और महामारी से निपटने की तैयारी के लिए प्रस्तावित आर्थिक योगदान से जुड़ी थीं।

ईयू ने अपने आधिकारिक बयान में कहा क‍ि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर अपनी इच्छा से और दोनों पक्षों की सहमति वाली शर्तों पर होना चाहिए। ईयू ने कहा कि विश्व व्यापार संगठन (डब्‍ल्‍यूटीओ) के बौद्धिक संपदा समझौते और दोहा घोषणा का जिक्र करते समय उनके मूल दस्तावेजों का सही और पूरा मतलब सामने आना चाहिए। हालांकि, यूरोपीय संघ ने माना कि घोषणापत्र में कई उपयोगी बातें भी शामिल हैं।

इनमें महामारी से निपटने के लिए देशों की तैयारी की योजना, बीमारियों की निगरानी, समय रहते बीमारी का पता लगाना, टीकाकरण, स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका और 'वन हेल्थ' का नजरिया शामिल है। 'वन हेल्थ' इंसानों, जानवरों और पर्यावरण की सेहत को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ मानता है।

इसके बावजूद ईयू ने कहा कि यह दस्तावेज उसकी उम्मीदों पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता और इसमें कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिन्हें वह 'स्पष्ट रेड लाइन' मानता है।

ईयू ने महामारी की तैयारी के लिए दुनिया में फंडिंग की कमी से जुड़े पुराने अनुमानों पर भी आपत्ति जताई। साथ ही उसने इस बात पर चिंता जताई कि महामारी की तैयारी पर हो रहे खर्च की निगरानी के लिए कोई वैश्विक व्यवस्था नहीं है।

घोषणापत्र में मजबूत लैब, समय रहते चेतावनी देने वाले सिस्टम और आपात स्थिति में बेहतर तालमेल की मांग की गई है।

इसमें वैक्सीन, दवाओं और बीमारी की जांच के साधनों तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित करने की भी बात कही गई है।

घोषणापत्र अलग-अलग देशों और क्षेत्रों में जरूरी मेडिकल सामान बनाने की क्षमता बढ़ाने को भी बढ़ावा देता है, ताकि महामारी का खतरा सामने आने के बाद पहले 100 दिनों के भीतर जरूरी उत्पाद उपलब्ध कराए जा सकें।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्‍लयूएचओ) के महानिदेशक टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस ने चेतावनी दी कि भविष्य की महामारियों से निपटने के लिए अभी और ज्यादा कदम उठाने और निवेश करने की जरूरत है।

उन्होंने कहा क‍ि "कोविड-19 महामारी ने वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा की कमजोरियों को उजागर किया और उन्हें और गंभीर बनाया। इसने दुनिया को कई दर्दनाक सबक भी सिखाए।"