नई दिल्ली। हर साल 29 सितंबर को 'विश्व कद्दू दिवस' मनाया जाता है। अमेरिका में जन्मा कद्दू आज भारतीय रसोई की शान है। इसे काशीफल, कुम्हड़ा और पेठा भी कहते हैं। इसे आयुर्वेद में औषधीय फल माना गया है। वहीं, पितृपक्ष में कद्दू का महत्व कई गुना बढ़ जाता है, क्योंकि इस दौरान कई घरों में खास तौर पर बिना प्याज-लहसुन के कद्दू की खट्टी-मीठी सब्जी बनाई जाती है।दरअसल, पितृपक्ष में अपने पितरों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने के साथ ही, ब्राह्मण भोज और पितरों के निमित्त सात्विक भोजन तैयार करने की भी परंपरा है। इस भोजन में कई ऐसी चीजें शामिल की जाती हैं, जिनका धार्मिक और पारंपरिक महत्व माना गया है। इन्हीं में से एक है कद्दू की सब्जी।
धार्मिक और लोक मान्यताओं के अनुसार, पितरों के लिए तैयार किया जाने वाला भोजन सात्विक और शुद्ध होना चाहिए। कद्दू को भी सात्विक सब्जियों में गिना जाता है। यही वजह है कि श्राद्ध के भोजन में इसका इस्तेमाल कई जगहों पर विशेष रूप से किया जाता है।
मान्यता है कि पितरों के निमित्त तैयार किए गए सात्विक भोजन से उन्हें तृप्ति मिलती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है।
कद्दू की एक खास बात यह भी है कि इसे बिना प्याज और लहसुन के आसानी से स्वादिष्ट बनाया जा सकता है। पितृपक्ष में तामसिक भोजन से परहेज किया जाता है, इसलिए कद्दू की साधारण, सात्विक और हल्की सब्जी श्राद्ध की थाली का हिस्सा बन जाती है।
कद्दू को लेकर भारत के अलग-अलग हिस्सों में कई लोक मान्यताएं भी प्रचलित हैं। कुछ क्षेत्रों में इसे परिवार के बड़े बेटे का प्रतीक तक माना जाता है। इसी कारण कुछ परिवारों में महिलाएं कद्दू को सीधे काटने से परहेज करती हैं। पहले घर का कोई पुरुष कद्दू को दो हिस्सों में काटता है और इसके बाद महिलाएं सब्जी बनाने के लिए उसके छोटे टुकड़े करती हैं।
कुछ जगहों पर कद्दू को अकेले काटने की भी परंपरा नहीं है। इसकी जोड़ी बनाने के लिए साथ में नींबू, मिर्च या कोई दूसरी सब्जी रख दी जाती है।














