नई दिल्ली, 30 मई । अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के जेएनयू सचिव प्रवीण पियूष ने शनिवार को आईएएनएस से बातचीत के दौरान कहा कि एबीवीपी त्रिभाषा फॉर्मूले का समर्थन करता है। उन्होंने कहा कि भारत जैसे देश में, जहां भाषाई और सांस्कृतिक विविधता बहुत ज्यादा है, वहां तीन भाषाओं का फॉर्मूला एक तरह से उस विविधता को सम्मान देने का प्रयास है। उनका कहना है कि 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में सैकड़ों भाषाएं और हजारों बोलियां मौजूद हैं और संविधान की आठवीं अनुसूची में कई भाषाओं को आधिकारिक दर्जा मिला हुआ है। ऐसे में किसी एक भाषा को प्राथमिकता देना या बाकी को नजरअंदाज करना ठीक नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि भाषा सिर्फ संवाद का साधन नहीं होती, बल्कि वह किसी भी समाज की संस्कृति, सोच और सभ्यता को समझने का माध्यम होती है। उनके अनुसार हर भाषा अपने साथ एक पूरी ज्ञान परंपरा, इतिहास और जीवन दृष्टि लेकर चलती है। इसलिए जब कोई व्यक्ति किसी दूसरी भाषा को सीखता है, तो वह सिर्फ शब्द नहीं सीखता, बल्कि एक पूरी संस्कृति को समझने की कोशिश करता है।
प्रवीण पियूष ने कहा कि शिक्षा का सबसे अच्छा तरीका यह है कि बच्चे अपनी मातृभाषा में पढ़ाई करें, क्योंकि इससे वे चीजों को बेहतर समझ पाते हैं और उनका सीखना मजबूत होता है। साथ ही उन्होंने यह भीकहा कि सिर्फ मातृभाषा ही नहीं, बल्कि अन्य भाषाओं का ज्ञान भी जरूरी है ताकि लोग देश के अलग-अलग हिस्सों और विदेशों से भी जुड़ सकें।
उनका मानना है कि त्रिभाषा फॉर्मूला छात्रों के लिए बहुत उपयोगी है क्योंकि इससे वे अपनी स्थानीय भाषा, मातृभाषा के साथ-साथ एक अन्य भारतीय भाषा और अंग्रेजी जैसी भाषा भी सीख सकते हैं। इससे न केवल उनका ज्ञान बढ़ेगा, बल्कि रोजगार और वैश्विक अवसरों में भी उन्हें फायदा मिलेगा।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत की सबसे बड़ी खूबी 'विविधता में एकता' है और भाषा के माध्यम से इस एकता को और मजबूत किया जा सकता है। उनके अनुसार उत्तर भारत और दक्षिण भारत के बीच किसी तरह का विभाजन नहीं होना चाहिए, बल्कि लोगों को एक-दूसरे की भाषाओं और संस्कृतियों को समझने की कोशिश करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर कोई उत्तर भारतीय तमिल साहित्य पढ़ता है तो वह दक्षिण की संस्कृति को समझ सकता है और अगर कोई दक्षिण भारतीय हिंदी सीखता है तो वह उत्तर भारत की संस्कृति और ज्ञान परंपरा से जुड़ सकता है।
वहीं, तमिलनाडु में इसे हिंदी थोपने के रूप में देखा जा रहा है। इस पर उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यह भाषा थोपने का मामला नहीं है। त्रिभाषा फॉर्मूले में छात्र को विकल्प मिलता है कि वह कौन-सी भाषा चुने, इसलिए इसे थोपना कहना सही नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि विरोध करने वाले अलग-अलग राज्यों और लोगों की अपनी-अपनी राय हो सकती है, लेकिन उनका मानना है कि यह नीति छात्रों के बौद्धिक, सांस्कृतिक और व्यावसायिक विकास के लिए जरूरी है। इसलिए इसे पूरे देश में जल्द से जल्द लागू किया जाना चाहिए।

