धर्मशाला। बाएं घुटने की सर्जरी के बाद तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा लद्दाख के लेह में हैं। दलाई लामा ने गुरुवार को कहा कि पहले की तरह इस समय यहां का मौसम उनकी सेहत के लिए बहुत अच्छा है, इसलिए वे अगले कुछ हफ्तों तक यहीं रहने वाले हैं।अपने 91वें जन्मदिन पर शुभकामनाएं देने वाले सभी अनुयायियों और शुभचिंतकों का धन्यवाद करते हुए नोबेल शांति पुरस्कार विजेता दलाई लामा ने कहा, "मेरे 91वें जन्मदिन पर मुझे शुभकामनाएं देने के लिए आप सभी का धन्यवाद। जैसा कि मैंने 6 जुलाई को लेह में मौजूद लोगों से कहा था, जब मैं अपने जीवन को पीछे मुड़कर देखता हूं तो मुझे लगता है कि मेरी साधना का सबसे बड़ा उद्देश्य हमेशा दूसरों का भला करना रहा है। यही भावना हर सुबह मुझे जगने के साथ प्रेरित करती है।"

उन्होंने कहा, "दया और करुणा फैलाना आज भी मेरे जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य है। अगर हम दुनिया को सभी के लिए बेहतर बनाना चाहते हैं तो यह सोच बहुत जरूरी है, इसलिए मैं दुनिया भर के अपने सभी भाइयों-बहनों, चाहे वे युवा हों या बुजुर्ग, सभी से अपील करता हूं कि वे दूसरों की भलाई की सच्ची चिंता करते हुए प्यार, दया और करुणा का व्यवहार करें।"

उन्होंने कहा, "मेरे विश्वास के अनुसार, यही एक अर्थपूर्ण और उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने का सही तरीका है—ऐसा जीवन जो दूसरों की सेवा के लिए समर्पित हो।"

दलाई लामा ने कहा, "जैसा कि आप जानते होंगे, पिछले महीने नई दिल्ली में मेरे बाएं घुटने की सर्जरी सफलतापूर्वक हुई थी। उसके बाद से मैं लद्दाख में आराम कर रहा हूं। पहले की तरह इस समय यहां का मौसम मेरी सेहत के लिए बहुत अनुकूल है, इसलिए मैंने अगले कुछ हफ्तों तक यहीं रहने का फैसला किया है।"

6 जुलाई को दलाई लामा के 91वें जन्मदिन के मौके पर लेह के शेवात्सेल टीचिंग ग्राउंड में खुशी के साथ समारोह मनाया गया।

इस दौरान उन्होंने कहा, "आज मेरा 91वां जन्मदिन है। जब मैं अपने जीवन को देखता हूं तो महसूस करता हूं कि दूसरों की मदद करने की भावना हमेशा मेरी साधना का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। हर सुबह उठते ही सबसे पहले यही विचार मेरे मन में आता है। दुनिया भर के लोग शायद इसी वजह से मेरा सम्मान करते हैं, क्योंकि मैं दूसरों का भला करने और उनके प्रति प्रेम व करुणा रखने की कोशिश करता हूं।"

उन्होंने कहा, "मैं अब 91 साल का हूं, लेकिन मेरे सपनों से मिलने वाले संकेत बताते हैं कि शायद मैं 130 साल तक जीवित रहूं। इसलिए मैं उम्मीद करता हूं कि मैं बुद्ध के उपदेशों के जरिए चीन के लोगों की भी मदद कर सकूं और दुनिया भर के लोगों को अच्छा और सकारात्मक जीवन जीने के लिए प्रेरित कर सकूं। यही मेरी इच्छा है। धन्यवाद।"

दलाई लामा दुनिया में शांति और धार्मिक सौहार्द को बढ़ावा देने वाले सबसे सम्मानित आध्यात्मिक नेताओं में से एक माने जाते हैं।

उनके कार्यालय के अनुसार, वे पिछले 55 वर्षों से भी अधिक समय से लद्दाख आते रहे हैं। यहां के लोगों का उनके साथ गहरा भावनात्मक और आस्था से जुड़ा रिश्ता है। दलाई लामा 1959 में चीन की सेना की ओर से ल्हासा पर नियंत्रण किए जाने के बाद अपने कई समर्थकों के साथ तिब्बत छोड़कर भारत आए थे। इसके बावजूद उन्हें आज भी उम्मीद है कि एक दिन वे फिर से तिब्बत लौट सकेंगे।