नई दिल्ली। बांग्लादेश के समुद्री बंदरगाहों पर नियंत्रण हासिल कर बंगाल की खाड़ी और उससे आगे अपने रणनीतिक हितों को बढ़ाने की चीन की योजना को झटका लगा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) सरकार ने देश के बंदरगाहों के आधुनिकीकरण के लिए अन्य वैश्विक बंदरगाह संचालकों को ठेके दिए हैं।ब्रिकलैन न्यूज पोर्टल पर प्रकाशित लेख में कहा गया है कि पिछले जून में बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की बीजिंग यात्रा के दौरान यह फैसला लिया गया था कि चीन मोंगला बंदरगाह का विकास करेगा। बंदरगाह की माल ढुलाई क्षमता बढ़ाने के लिए चीन की वित्तीय सहायता से एक परियोजना के तहत मोंगला बंदरगाह पर आधुनिक मशीनों से लैस दो अत्याधुनिक कंटेनर जेटी का निर्माण किया जाना था।

हालांकि, हालिया घटनाक्रम में चटगांव पोर्ट अथॉरिटी ने डेनमार्क के मार्स्क ग्रुप के साथ 30 साल का समझौता किया है। दुनिया की प्रमुख टर्मिनल संचालक कंपनियों में शामिल मार्स्क ग्रुप इस समझौते के तहत सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) ढांचे के अंतर्गत चटगांव बंदरगाह पर लाडिया कंटेनर टर्मिनल की डिजाइनिंग, वित्तपोषण, निर्माण और संचालन करेगा।

हाल के वर्षों में ढाका की लगातार सरकारें बांग्लादेश के समुद्री बंदरगाहों के विकास के लिए अन्य विदेशी कंपनियों को शामिल करके चीन पर पूरी तरह निर्भर रहने से बचती रही हैं। जापान अंतरराष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (जेआईसीए) के रियायती ऋण से मातारबाड़ी बंदरगाह के विकास और डेनमार्क के मार्स्क ग्रुप के साथ चटगांव में लाडिया कंटेनर टर्मिनल के विकास से जुड़े दोनों समझौतों पर 2025 में हस्ताक्षर किए गए थे, जब देश में अंतरिम सरकार सत्ता में थी।

पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भी बांग्लादेश की समुद्री परिसंपत्तियों के आसपास चीन की बढ़ती व्यावसायिक और तकनीकी मौजूदगी को लेकर भारत की चिंताओं पर ध्यान दिया था। भारत के निकट रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थानों पर चीन की मौजूदगी बढ़ने की आशंकाओं के मद्देनजर उन्होंने चीनी सहायता से सोनादिया में गहरे समुद्र का बंदरगाह बनाने की मंजूरी देने से इनकार कर दिया था।

पतेंगा कंटेनर टर्मिनल चटगांव बंदरगाह का पहला ऐसा टर्मिनल है, जिसका संचालन किसी विदेशी कंपनी द्वारा किया जा रहा है। सऊदी अरब की कंपनी रेड सी गेटवे टर्मिनल इस टर्मिनल का संचालन कर रही है। इसे जून 2025 में परिचालन के लिए शुरू किया गया था।

चीनी कंपनियां फिलहाल चटगांव बंदरगाह पर बंदरगाह संबंधी मशीनों की आपूर्ति करने, आसपास औद्योगिक पार्क बनाने और आगामी टर्मिनल आधुनिकीकरण परियोजनाओं में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में काम कर रही हैं।

बांग्लादेश और चीन के बीच सरकार-से-सरकार पहल के तहत चटगांव के अनवारा में 800 एकड़ भूमि पर चीन आर्थिक एवं औद्योगिक क्षेत्र का निर्माण शुरू हो गया है। इसका उद्देश्य निर्यातोन्मुखी उद्योगों में चीन और अन्य देशों से निवेश आकर्षित करना है।

इसके अलावा, इंडोनेशिया की सरकारी कंपनी पीटी पर्टामिना ट्रांस कॉन्टिनेंटल को कॉक्स बाजार स्थित सुविधा के संचालन और रखरखाव के लिए पांच साल का ठेका दिया गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह बांग्लादेश के अधिकारी अब चटगांव बंदरगाह पर टर्मिनल पट्टे पर देने और उनके संचालन के लिए चीनी कंपनियों के बजाय अन्य अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को प्राथमिकता दे रहे हैं। चटगांव बंदरगाह बांग्लादेश के निर्यात और आयात व्यापार का प्रमुख केंद्र है।

रिपोर्ट के अनुसार, अनवारा परियोजना जैसी पहलों के जरिए चटगांव में चीन की मौजूदगी बढ़ने से उसके व्यावसायिक हितों को फायदा होगा। मोंगला बंदरगाह की सुविधाओं के विकास में चीन की भागीदारी से बीजिंग को बांग्लादेश के कपड़ा व्यापार में मदद मिलेगी। बांग्लादेश का परिधान उद्योग मुख्य रूप से ढाका में केंद्रित है। मोंगला बंदरगाह, चटगांव बंदरगाह की तुलना में ढाका के अधिक नजदीक है।

हालांकि, वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर नियंत्रण हासिल करने या भारत को चारों ओर से घेरने की अपनी 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से हिंद महासागर क्षेत्र में चीनी वर्चस्व बढ़ाने के लिए केवल मोंगला बंदरगाह पर नियंत्रण पर्याप्त नहीं होगा।

रिपोर्ट में कहा गया है कि मोंगला समुद्र से लगभग 100 किलोमीटर दूर स्थित एक नदी बंदरगाह है, इसलिए यह नौसैनिक अड्डे के रूप में उपयुक्त नहीं है। वहीं, चटगांव में बंदरगाह और जहाजरानी क्षेत्र में प्रमुख पश्चिमी शक्तियों के समर्थन वाली वैश्विक कंपनियों की मौजूदगी के कारण चीन की नौसैनिक उपस्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकेगा।

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि ढाका सरकार का दृष्टिकोण ऐसा प्रतीत होता है कि वह बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के निर्यात-आधारित क्षेत्र को मजबूत करने के लिए चीनी निवेश को प्रोत्साहित करना चाहती है, लेकिन साथ ही चीन को देश के समुद्री बंदरगाहों का इस्तेमाल अपने रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए करने का अवसर नहीं देना चाहती।