टोक्यो। आस्था की कोई भाषा नहीं होती, कोई सीमा नहीं होती। जब दिल सच्चा हो तो हजारों किलोमीटर की दूरी और अलग-अलग भाषाएं भी बाधा नहीं बन पातीं। यही सच जापान की राजधानी टोक्यो में आयोजित पूज्य बागेश्वर सरकार के दो दिवसीय आशीर्वचन कार्यक्रम में साफ नजर आया।
टोक्यो के इंडियन इंटरनेशनल स्कूल में आयोजित इस कार्यक्रम में भारतीय मूल के लोगों के साथ बड़ी संख्या में जापानी श्रद्धालु भी पहुंचे। वे बागेश्वर सरकार से व्यक्तिगत भेंट कर आशीर्वाद ले रहे थे। माहौल भक्ति और श्रद्धा से भरा था। भाषा अलग थी, देश अलग था, लेकिन भावनाएं एक जैसी थीं।
कार्यक्रम के दौरान बागेश्वर सरकार ने भारत और जापान की धार्मिक-सांस्कृतिक समानताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि दोनों देशों में देवी-देवताओं की पूजा की प्राचीन परंपरा रही है। भगवान गणेश का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि जापान में भी उन्हें विघ्नहर्ता के रूप में श्रद्धा से पूजा जाता है, भले ही नाम और पूजा की परंपराओं में कुछ अंतर हो। यह बात सुनकर उपस्थित जापानी श्रद्धालु भावुक हो गए।
कार्यक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना एक जापानी श्रद्धालु का बागेश्वर सरकार के प्रति समर्पण। भाषा की दीवार और देश की सीमाएं अलग होने के बावजूद उनकी आस्था पूरी तरह जुड़ी हुई दिखी। सनातन संस्कृति और बागेश्वर सरकार के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने गहरी श्रद्धा और सम्मान व्यक्त किया। शब्दों की जरूरत नहीं पड़ी। भाव ही काफी थे।
यह दृश्य सिर्फ एक कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था। यह इस बात का जीवंत प्रमाण था कि सनातन संस्कृति अब भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रह गई है। दुनिया के कोने-कोने में लोग इसके विचारों से जुड़ रहे हैं। भारत से हजारों किलोमीटर दूर जापान में दिख रहा यह समर्पण वैश्विक स्तर पर सनातन संस्कृति के बढ़ते आकर्षण को दर्शाता है।
बागेश्वर सरकार के प्रति जापानी श्रद्धालु की यह भक्ति एक साफ संदेश देती है—देश और भाषा अलग हो सकते हैं, लेकिन श्रद्धा और आध्यात्मिक भावनाएं लोगों को एक सूत्र में पिरो सकती हैं। सच्ची भावना हो तो शब्दों की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। टोक्यो का यह आशीर्वचन कार्यक्रम उसी भावना का प्रतीक बन गया है।




