इंदौर। मध्य प्रदेश के इंदौर में 13 करोड़ 32 लाख रुपये की बड़ी स्टाम्प ड्यूटी चोरी के मामले में कानूनी अड़चनें दूर हो गई हैं। लगभग एक साल से ठप पड़ी जांच को अब आर्थिक अपराध शाखा (EOW) फिर से आगे बढ़ाएगी। इंदौर हाईकोर्ट ने मामले में दर्ज एफआईआर (FIR) को रद्द कराने के लिए दायर की गई सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया है। कोर्ट के इस फैसले से बिल्डर विवेक चुघ और दो वरिष्ठ पंजीयन अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ना तय माना जा रहा है।
किन अधिकारियों और बिल्डर पर है गाज?
ईओडब्ल्यू द्वारा जुलाई 2025 में दर्ज की गई इस एफआईआर में निम्नलिखित प्रमुख नाम शामिल हैं:
- अमरेश नायडू (वरिष्ठ जिला पंजीयक)
- संजय सिंह (उप पंजीयक)
- विवेक चुघ (बिल्डर)
इन तीनों ने एफआईआर निरस्त कराने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पूर्व में पुलिस की दंडात्मक कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा रखी थी, लेकिन अब याचिकाएं खारिज होने के बाद ईओडब्ल्यू को आगे की दंडात्मक और कानूनी कार्रवाई करने का रास्ता साफ हो गया है।
क्या है पूरा घोटाला?
यह मामला इंदौर की सांवेर तहसील के अंतर्गत एबी रोड स्थित डीएलएफ गार्डन सिटी कॉलोनी का है: सितंबर से अक्टूबर 2024 के बीच यहाँ 9 कमर्शियल प्लॉट खरीदे गए थे, जिनकी रजिस्ट्री में मात्र ₹5.38 करोड़ की स्टाम्प ड्यूटी चुकाई गई थी। बड़े पैमाने पर राजस्व चोरी की शिकायत मिलने के बाद अपर कलेक्टर ने जांच के आदेश दिए। अप्रैल 2025 में आई जांच रिपोर्ट में चौंकाने वाली गड़बड़ी सामने आई।
गाइडलाइन में हेराफेरी
जमीन की वास्तविक सरकारी गाइडलाइन दर ₹25,400 प्रति वर्गमीटर थी, लेकिन रजिस्ट्री करते समय केवल ₹14,200 प्रति वर्गमीटर की दर लगाई गई। इसके अलावा, चूंकि यह जमीन नेशनल हाईवे (NH) पर स्थित है, इसलिए नियमानुसार इसकी गाइडलाइन दर दोगुनी यानी ₹50,800 प्रति वर्गमीटर होनी चाहिए थी। सही गाइडलाइन दर (₹50,800/वर्गमीटर) के हिसाब से कुल ₹18.71 करोड़ की स्टाम्प ड्यूटी बनती थी, जबकि जमा केवल ₹5.38 करोड़ कराए गए। इस तरह से सीधे तौर पर ₹13.32 करोड़ की स्टाम्प ड्यूटी चोरी का खुलासा हुआ।
याचिकाकर्ताओं के तर्क
हाईकोर्ट में अमरेश नायडू, संजय सिंह और विवेक चुघ की ओर से तर्क दिया गया कि:
- अपर कलेक्टर को इस मामले में ऐसी जांच करने का विधिक अधिकार नहीं था।
- खरीदे गए प्लॉट कॉलोनी की मुख्य सीमा के बाहर हैं, इसलिए उन पर कॉलोनी की दरें लागू नहीं होतीं।
- रजिस्ट्री के समय नियमों के तहत सही स्टाम्प ड्यूटी चुकाई गई थी और जांच रिपोर्ट का मूल्यांकन गलत है।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: "दस्तावेजों में हेराफेरी और नक्शे से छेड़छाड़"
हाईकोर्ट के जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की खंडपीठ ने 16 पन्नों का विस्तृत आदेश जारी करते हुए याचिकाओं को खारिज कर दिया: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला सिर्फ कम स्टाम्प ड्यूटी चुकाने का साधारण विवाद नहीं है, बल्कि इसमें सरकारी अधिकारियों की साठगांठ से नक्शे में फेरबदल और रजिस्ट्री में अधूरे दस्तावेज अपलोड करने जैसी गंभीर धांधली शामिल है। अदालत ने कहा कि एफआईआर को रद्द केवल अति-दुर्लभ मामलों में ही किया जा सकता है। इस मामले में लगे धोखाधड़ी और पद के दुरुपयोग के आरोपों की निष्पक्ष जांच होना अति आवश्यक है, इसलिए ईओडब्ल्यू को कार्रवाई से नहीं रोका जा सकता।














