नई दिल्ली। केंद्र की रेयर अर्थ की मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की योजना को जबरदस्त मिला है और 20 बोलियां प्राप्त हुई हैं। इससे देश में रेयर अर्थ इकोसिस्टम को बढ़ावा मिलेगा। यह जानकारी भारी उद्योग मंत्रालय की ओर से गुरुवार को दी गई।आधिकारिक बयान में कहा गया कि भारी उद्योग मंत्रालय (एमएचआई) को सिन्टर्ड रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (आरईपीएम) के विनिर्माण को बढ़ावा देने की योजना के अंतर्गत 20 बोलियां प्राप्त हुई हैं। यह देश में आरईपीएम के घरेलू विनिर्माण तंत्र को मजबूत करने और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

25 नवंबर 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 7,280 करोड़ रुपए के वित्तीय प्रावधान के साथ "सिंटर्ड रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (आरईपीएम) के निर्माण को बढ़ावा देने की योजना" को मंजूरी दी थी। भारी उद्योग मंत्रालय ने 15 दिसंबर 2025 को योजना की अधिसूचना जारी की।

सीपीपी पोर्टल पर 20 मार्च 2026 को प्रस्ताव के लिए अनुरोध जारी किया गया था। इसके लिए 7 अप्रैल 2026 को बोली-पूर्व सम्मेलन आयोजित किया गया। बोलियां जमा करने की अंतिम तिथि 12 अगस्त 2026 थी। तकनीकी बोलियां 13 अगस्त 2026 को बोलीदाताओं की मौजूदगी में भारी उद्योग मंत्रालय में खोली गईं।

अपनी तरह की इस पहली योजना का उद्देश्य भारत में एकीकृत रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट विनिर्माण संयंत्रों की कुल 6 हजार मीट्रिक टन प्रति वर्ष क्षमता स्थापित करना है। इससे देश में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी और वैश्विक आरईपीएम बाजार में भारत की स्थिति मजबूत होगी।

योजना के अंतर्गत वैश्विक प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के माध्यम से कुल क्षमता पांच लाभार्थियों को आवंटित की जाएगी। प्रत्येक लाभार्थी को अधिकतम 1,200 मीट्रिक टन प्रति वर्ष की क्षमता आवंटित की जाएगी।

मंत्रालय के मुताबिक, योजना की कुल अवधि सात वर्ष की होगी। इसमें एकीकृत आरईपीएम विनिर्माण संयंत्र स्थापित करने के लिए दो वर्ष की अवधि और आरईपीएम की बिक्री पर प्रोत्साहन देने के लिए पांच वर्ष की अवधि शामिल है।

रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट दुनिया के सबसे शक्तिशाली मैग्नेट में शामिल हैं। इनका व्यापक इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहनों, विंड टर्बाइनों, उच्च तकनीक वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, एयरोस्पेस और रक्षा प्रणालियों में किया जाता है। भारत में एनडीपीआर ऑक्साइड से लेकर तैयार मैग्नेट तक पूरी मूल्य श्रृंखला विकसित करने से इस क्षेत्र में आयात पर निर्भरता कम होने की उम्मीद है।