भोपाल। मध्य प्रदेश कैडर (2011 बैच) की आईएएस अधिकारी नेहा मारव्या एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई हैं। जनजातीय कार्य विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों ने शुक्रवार को उनके खिलाफ मोर्चा खोलते हुए 'पेन डाउन' (काम बंद) हड़ताल कर दी। संचालनालय के आदि भवन पर एकत्रित सौ से अधिक कर्मचारियों ने जनजातीय क्षेत्रीय विकास परियोजना की संचालक नेहा मारव्या के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। विरोध बढ़ता देख आईएएस अधिकारी ने अपना फोन बंद कर लिया है।


कर्मचारियों और अधिकारियों के प्रमुख आरोप

हड़ताल पर बैठे कर्मचारियों ने आईएएस नेहा मारव्या की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं: कर्मचारियों से बदतमीजी और अभद्रता से बातचीत करना। बात-बात पर नोटिस थमाना और निलंबित करने की धमकियां देना। बिना ठोस कारण के कर्मचारियों के इंक्रीमेंट (वेतन वृद्धि) रोकना। केंद्र सरकार की महत्वपूर्ण योजनाओं के फंड और क्रियान्वयन को बाधित करना।


लाखों महिलाओं का 'आहार अनुदान' अटका

विवाद का सबसे बड़ा कारण पीवीटीजी (विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह) का रुका हुआ फंड है। योजना के तहत प्रदेश की बैगा, सहरिया और भारिया जनजाति की करीब 2.40 लाख महिलाओं को हर महीने 1,500 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाती है। अगस्त महीने की लगभग 30 करोड़ रुपये की राशि अब तक हितग्राहियों के खातों में नहीं पहुंची है, जिसका सीधा आरोप संचालक पर लग रहा है।


शासन स्तर पर उठी हटाने की मांग

इस मामले ने अब प्रशासनिक हलकों में तूल पकड़ लिया है: राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष रामलाल रौतेल ने इसे गंभीरता से लेते हुए मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव (CS) को पत्र लिखा है। उन्होंने मारव्या पर केंद्रीय योजनाओं को प्रभावित करने का आरोप लगाते हुए उन्हें पद से हटाने की मांग की है। राजपत्रित अधिकारी संघ ने भी मुख्य सचिव को औपचारिक पत्र भेजकर संचालक के आपत्तिजनक व्यवहार की शिकायत दर्ज कराई है।


"मुझे 14 साल तक दीवारों में कैद रखा गया"

आईएएस नेहा मारव्या कुछ समय पहले भी अपने बयानों के कारण सुर्खियों में थीं। आईएएस ऑफिसर्स एसोसिएशन के एक व्हाट्सएप ग्रुप में उन्होंने फील्ड पोस्टिंग (कलेक्टर) न मिलने पर सार्वजनिक रूप से अपना दर्द बयां किया था।


आईएएस ज्ञानेश्वर पाटिल के एक 'कांसेप्ट नोट' (जिसमें 14 साल की नौकरी में 4 साल कलेक्टरी मिलने की बात थी) के जवाब में नेहा ने लिखा था: "मुझे अपनी 14 साल की नौकरी में एक बार भी फील्ड की पोस्टिंग नहीं मिली। साढ़े 3 साल पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में और फिर ढाई साल से राजस्व विभाग में बिना काम का उप सचिव बनाकर बैठा दिया गया। 9 महीने से सिर्फ ऑफिस आती हूं और चली जाती हूं। मुझे दीवारों में कैद करके रख दिया गया है।"


प्रशासनिक महकमे में अब इस बात पर नजर है कि मुख्य सचिव और सरकार इस बढ़ते विरोध और हड़ताल पर क्या कदम उठाते हैं।