भोपाल। सागर जिले के बंडा में जहरीली शराब से हुई 22 लोगों की मौत के मामले में एक बार फिर मध्यप्रदेश में परोसी जा रही जहरीली शराब के मुद्दे को गर्म कर दिया है। बंडा के पहले मुरैना, छतरपुर और प्रदेश के आधा दर्जन स्थानों पर जहरीली शराब से मृत्यु के मामले सामने आ चुके हैं। आ​खिर जहरीली शराब होती क्या है? जिसके पीने से लोगों की जान चली जाती है। क्या शराब पीने वाले शराब को चखकर या उसकी बॉटल को देखकर पता लगा सकते हैं कि यह शराब असली है या फिर जहरीली। ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब लोगों को पता होने चाहिए। क्योकि मध्यप्रदेश के सभी गांव अवैध शराब की चपेट में हैं। खासतौर पर बुंदेलखंड में पुलिस और आबकारी विभाग के संरक्षण मे हर गांव के भीतर अवैध शराब के ठेके चल रहे हैं। इन्हीं ठेकों से मिलने वाली शराब कई बार किसी के लिए मौत का सामन बन जाती है। आज के प्वाइंट टू प्वाइंट में समझते हैं कि नकली या जहरीली शराब होती क्या है? और इसे कैसे पहचाना जा सकता है।


सबसे पहले समझ लेते हैं कि जहरीली शराब होती क्या है और यह शरीर को कैसे नुकसान पहुंचाती है...?

दरअसल शराब में नशा एक ही चीज से आता है, अल्कोहल। लेकिन अल्कोहल भी एक जैसा नहीं होता, दो तरह के अल्कोहल हैं, एक शरीर के लिए, दूसरा फैक्ट्री के लिए। पीने वाला अल्कोहल- एथेनॉल: हर वैध शराब में यही होता है। शरीर इसे धीरे-धीरे तोड़ना जानता है, इसीलिए यह जानलेवा नहीं होता। जहर वाला अल्कोहल- मेथेनॉल: यह पीने के लिए बना ही नहीं है, यही केमिकल पेंट थिनर, वाइपर फ्लूइड और फर्नीचर पॉलिश में इस्तेमाल होता है। देखने, सूंघने और चखने में यह एथेनॉल से मुश्किल से अलग पहचाना जा सकता है। नकली शराब वही है, जिसमें असली एथेनॉल की जगह या उसके साथ यह मेथेनॉल मिला दिया जाता है, वजह है- कम कीमत। असली शराब पर एक्साइज ड्यूटी लगती है, जबकि मेथेनॉल औद्योगिक इस्तेमाल के लिए सस्ता और आसानी से मिल जाता है। WHO की मेथेनॉल पॉइजनिंग आउटब्रेक गाइडेंस के मुताबिक दुनिया भर में ऐसे हादसे लगभग हमेशा इसी वजह से होते हैं, नकली कारोबारी असली ब्रांड की बोतल-लेबल जस की तस कॉपी कर लेते हैं और अंदर यही जहर भर देते हैं। सागर वाली शराब भी स्थानीय नहीं थी। पुलिस जांच में सामने आया कि यह उत्तर प्रदेश के ललितपुर से नकली रैपर और फर्जी बार कोड-QR कोड के साथ सप्लाई की गई थी। इस नेटवर्क की भनक चार महीने पहले ही मिल चुकी थी। हालांकि, ललितपुर पुलिस इन आरोपों को खारिज कर रही है। 4 मई 2026 को कोतवाली ललितपुर में दर्ज FIR में 1,45,820 नकली रैपर, 5,329 नकली ढक्कन और 9,109 खाली पाउच जब्त हुए थे, और उसी FIR में सौरभ ढाबा (बांदरी, सागर), राजविराज ढाबा (बडोदिया, सागर) और लोकेंद्र सिंह बुंदेला का ढाबा (पलेथनी, सागर) समेत मध्य प्रदेश के सरकारी ठेकों तक सप्लाई की बात दर्ज थी।



अब समझते हैं कि यह शराब कैसे हमारे शरीर को जानलेवा हालातों तक पहुंचा देती है

दरअसल शराब में मिला मेथेनॉल पीते ही जहर का काम नहीं करता- असली खतरा तब शुरू होता है जब शरीर उसे पचाने बैठता है।

जानकार बताते हैं कि लिवर मेथेनॉल को असली शराब समझकर उसी तरह तोड़ने लगता है, और यही गलती जहर बना देती है। इसे चार स्टेप में समझिए…

1. शरीर के अंदर ही तेजाब बनना: लिवर मेथेनॉल को तोड़कर पहले फॉर्मेल्डिहाइड (शव सुरक्षित रखने वाला वही केमिकल) और फिर फॉर्मिक एसिड बना देता है- एक तेज तेजाब। डॉ. गुप्ता के मुताबिक, मेथेनॉल की थोड़ी मात्रा भी यह जहर बनाने के लिए काफी है।

2. खून खट्टा होना (मेटाबॉलिक एसिडोसिस): यह एसिड खून में घुलकर उसे बेहद तेजाबी बना देता है- यानी शरीर का पूरा अंदरूनी संतुलन बिगड़ जाता है। इससे सांस धीमी पड़ती है, बीपी गिरता है, दिल पर दबाव बढ़ता है। यही वजह है कि नशे में सोया व्यक्ति अक्सर सुबह मृत मिलता है।

3. आंखों की नस जलना: फॉर्मिक एसिड सीधे ऑप्टिक नर्व (आंख से दिमाग तक तस्वीर पहुंचाने वाली नस) पर हमला करता है। असर एक-आध घंटे में दिख सकता है- पहले धुंधलापन, फिर पूरी रोशनी जाने तक।

4. शरीर नीला पड़ना: खून ज्यादा तेजाबी होने पर अंगों तक ऑक्सीजन पहुंचनी बंद हो जाती है (हाइपोक्सिया)। इससे त्वचा नीली पड़ने लगती है (सायनोसिस)- यानी सांस लगभग रुकने के करीब पहुंच चुकी है। ऐसा ही सागर में पीड़ितों के साथ हुआ।


आमतौर पर 12-24 घंटे लगते हैं, इसलिए पीने के तुरंत बाद इंसान सामान्य महसूस करता है और किसी को शक नहीं होता। ज्यादा मिलावट में यह मिनटों में भी हो सकता है, जैसा बमुराबेड़ा में हुआ, जहां तीन लोगों की जान आधे घंटे में गई।


इसका इलाज मुमकिन है, समय पर मिले तो

सबसे भरोसेमंद तरीका डायलिसिस है, जिससे जहर सीधे खून से निकाला जाता है। दूसरा तरीका शुद्ध एथेनॉल या 'फोमेपिजोल' इंजेक्शन (करीब 10,000 रुपए का) देना है, जो लिवर को उलझाए रखता है ताकि वह मेथेनॉल को जहर बनाने से पहले असली शराब में लग जाए। फोमेपिजोल 2013 से WHO की जरूरी दवाओं की सूची में शामिल है, यानी यह प्रयोगात्मक नहीं, मान्य इलाज है। फिलहाल भर्ती 112 मरीजों पर डॉक्टर्स की सलाह है कि उन्हें तुरंत डायलिसिस पर लिया जाए, जरूरत हो तो जबलपुर-भोपाल शिफ्ट करें, और सरकार दिल्ली-मुंबई से फौरन फोमेपिजोल मंगवाए। उनके मुताबिक हर घंटा कीमती है- जितनी देर, जहर उतना बढ़ेगा।


क्या हम पता कर सकते हैं कि शराब असली है या नकली..?

दरअसल कुछ संकेत हैं जो इशारा कर सकते हैं कि यह शराब जानलेवा हो सकती है। सागर के मामले में जिस शराब की शिकायत सामने आई, वह सामान्य कीमत से 20 रुपए सस्ती बताई गई। ऐसे मामलों में असामान्य रूप से कम कीमत, खुली शराब या संदिग्ध तरीके से सील की गई बोतल जोखिम के संकेत हो सकते हैं। लेकिन इनमें से कोई भी चीज अपने-आप यह साबित नहीं करती कि शराब में मेथेनॉल है। FIR के मुताबिक, शराब का एक क्वार्टर 70 रुपए में खरीदा गया था और उसे सामान्य कीमत से सस्ता बताया गया। इसलिए यहां सवाल सिर्फ शराब में मिलावट का नहीं, बल्कि वह शराब कहां से आई और किस नेटवर्क के जरिए बेची गई, इसका भी है। उल्टी, सिरदर्द, चक्कर, धुंधला दिखना, कमजोरी या सांस लेने में परेशानी जैसे लक्षण दिखाई दें तो इसे सामान्य नशा मानकर सोने या घर पर इलाज करने के बजाय तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए।