नई दिल्ली। विश्व बैंक समूह के कार्यकारी निदेशक नीलकंठ मिश्रा ने शनिवार को कहा कि यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) की अनुमति देना एक अधिकार प्रदान करने वाला नियम होगा। हालांकि, भुगतान क्षेत्र में कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण इससे शुल्क में बड़ी बढ़ोतरी होने की आशंका कम है।राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित पांचवें कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव के दौरान आईएएनएस के साथ बातचीत में मिश्रा ने कहा कि एमडीआर लागू होने से व्यापक स्तर पर शुल्क बढ़ने की आशंकाएं मुक्त और प्रतिस्पर्धी बाजार में बढ़ा-चढ़ाकर पेश की जा सकती हैं।
उन्होंने कहा, "यह एक मुक्त बाजार है। जब तक किसी को यह आशंका नहीं है कि वित्तीय कंपनियां, बैंक या पेमेंट एग्रीगेटर आपस में मिलीभगत करके एक ही समय पर शुल्क बढ़ाना शुरू कर देंगे, तब तक इससे निपटने के अलग-अलग तरीके मौजूद हैं।"
मिश्रा ने कहा, "मुझे नहीं लगता कि इससे बड़े पैमाने पर शुल्क में बढ़ोतरी होगी, क्योंकि यह एक मुक्त और प्रतिस्पर्धी बाजार है। ऐसी कंपनियां भी थीं, जो एमडीआर शुल्क नहीं ले पाने के बावजूद अपना कारोबार चलाने में सक्षम रहीं और बाजार में बनी रहीं।"
वैश्विक अर्थव्यवस्था के परिदृश्य पर बात करते हुए विश्व बैंक के कार्यकारी निदेशक ने तेजी से बढ़ती ब्याज दरों को वैश्विक वित्तीय बाजारों के सामने मौजूद सबसे बड़ा जोखिम बताया।
उन्होंने कहा, "मेरे विचार में वैश्विक बाजारों के लिए सबसे बड़ा जोखिम तेजी से बढ़ती ब्याज दरें हैं, क्योंकि वित्तीय बाजारों का पूरा आधार पूंजी की लागत पर टिका होता है।"
मिश्रा के अनुसार, जोखिम-मुक्त ब्याज दरों में बढ़ोतरी से परिसंपत्तियों के मूल्य में गिरावट आ सकती है। इससे अत्यधिक कर्ज लेकर किए गए निवेश और संपत्तियों को गिरवी रखकर दिए गए ऋणों से जुड़ी कमजोरियां भी उजागर हो सकती हैं।
उन्होंने कहा, "अगर बॉन्ड यील्ड यानी जोखिम-मुक्त ब्याज दर बढ़ती है, तो परिसंपत्तियों का मूल्य नीचे आएगा। इसका मतलब है कि गिरवी रखी गई संपत्तियों के आधार पर दिए गए कई तरह के ऋण और उस समय लिए गए कई प्रकार के लीवरेज (उधार लेकर निवेश) अव्यावहारिक हो जाएंगे या उन्हें समाप्त करना पड़ेगा।"
तेल की ऊंची कीमतों, बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच वैश्विक बाजारों के दबाव के प्रति भारत की संवेदनशीलता पर मिश्रा ने माना कि जोखिम काफी महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, उन्होंने कहा कि भारत की स्थिति भारी कर्ज से जूझ रही कई अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अपेक्षाकृत बेहतर है।
उन्होंने कहा कि स्थिति में स्थिरता तभी आ सकती है, जब बॉन्ड यील्ड में गिरावट आए या आर्थिक विकास के मोर्चे पर कुछ ऐसे जोखिम सामने आएं, जिनके कारण बाजार को अपने आकलन पर दोबारा विचार करना पड़े।
मिश्रा ने कहा, "इस स्थिति के स्थिर होने का एकमात्र तरीका यह है कि या तो बॉन्ड यील्ड नीचे आए या आर्थिक विकास के मोर्चे पर कुछ जोखिम उभरें। ऐसे देश भी हैं, जिनका कर्ज-जीडीपी अनुपात बहुत अधिक है और जो संभवतः भारत की तुलना में कहीं ज्यादा संवेदनशील हैं।"
उन्होंने कहा, "इसलिए हमें बाहरी झटकों के प्रति सतर्क रहना होगा।"











