नई दिल्ली। भारत अपने सरकारी बॉन्ड के घरेलू निवेशकों के पास अधिक मात्रा में होने के कारण अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी के प्रभाव से अपेक्षाकृत सुरक्षित है। वहीं, वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच सुधारों के जरिए आर्थिक विकास को बनाए रखना देश के सामने दीर्घकालिक चुनौती है। यह जानकारी अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों की ओर से शनिवार को दी गई।राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित 5वें कौटिल्य आर्थिक सम्मेलन के साइडलाइन में आईएएनएस से बातचीत में भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर और अर्थशास्त्री माइकल देबब्रत पात्रा ने कहा कि अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी का भारत के डेट मार्केट पर सीधा असर सीमित है।
जब उनसे भारत जैसे उभरते बाजारों पर अमेरिकी यील्ड बढ़ने के प्रभाव के बारे में पूछा गया, तो पात्रा ने कहा, “वास्तव में ऐसा नहीं है, क्योंकि भारत के कुल सरकारी बॉन्ड में से केवल 3 प्रतिशत विदेशी निवेशकों के पास हैं। ज्यादातर बॉन्ड घरेलू स्तर पर ही रखे गए हैं।”
उन्होंने कहा कि हालांकि दुनियाभर में बॉन्ड यील्ड बढ़ने का व्यापक रुझान निवेशकों की धारणा को प्रभावित कर सकता है, लेकिन भारतीय बॉन्ड यील्ड को मुख्य रूप से घरेलू कारक प्रभावित करते हैं।
वहीं, विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर की उर्वरक की कमी और जारी भू-राजनीतिक संघर्षों से पैदा होने वाले संभावित वैश्विक खाद्य संकट की चेतावनी पर पात्रा ने कहा कि भारत उर्वरक आयात के अपने स्रोतों में सक्रिय रूप से विविधता ला रहा है।
उन्होंने आईएएनएस से कहा, “यूक्रेन और पश्चिम एशिया में युद्ध से आपूर्ति में बाधाएं पैदा हो रही हैं, लेकिन मेरा मानना है कि जहां ये कमी अस्थायी हो सकती है, वहीं लंबे समय में भारत अपने स्रोतों और आयात बाजारों में व्यापक विविधता लाएगा और स्थिति को संभाल लेगा।”
इस बीच, अर्थशास्त्री और नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद विरमानी ने उत्पाद-विशिष्ट सब्सिडी कम करने और सीधे सहायता देने की व्यवस्था की ओर बढ़ने की वकालत की।
विरमानी ने आईएएनएस से कहा, “सब्सिडी कम करना अच्छी बात है। सब्सिडी सीधे दी जानी चाहिए। सहायता देने के लिए सब्सिडी एक अप्रभावी तरीका है, क्योंकि इससे बाजार में विकृतियां पैदा होती हैं।”
उन्होंने इस बदलाव को सब्सिडी-मुक्त आर्थिक व्यवस्था की ओर व्यापक बदलाव का हिस्सा बताया।
भारत की विकास संभावनाओं पर विरमानी ने कहा कि मुख्य चुनौती विकास की रफ्तार को लगातार बढ़ाना नहीं, बल्कि मौजूदा विकास गति को बनाए रखना है।
उन्होंने कहा, “विकास का इतिहास बताता है कि आप इसे लगातार बढ़ाते नहीं रह सकते। आप सुधार करते हैं, विकास को ऊंचे स्तर तक ले जाते हैं और फिर चुनौती उस दर को बनाए रखने की होती है।”
उन्होंने यूक्रेन युद्ध जैसी वैश्विक बाधाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि ये नीति-निर्माताओं के सामने आने वाली बाहरी चुनौतियों को दर्शाती हैं।











