मुंबई। नेशनल अवॉर्ड विनर एक्टर मनोज बाजपेयी इन दिनों अपनी हालिया रिलीज फिल्म 'लास्ट मैन इन टावर' को लेकर चर्चा में हैं। फिल्म में उनके किरदार को दर्शकों की तरफ से अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है। आईएएनएस को दिए इंटरव्यू में मनोज ने बताया कि उनका किरदार परिवार में हमेशा 'अच्छा इंसान' और 'बड़ा इंसान' बने रहने की चाह में इतना आगे निकल जाता है कि वह अपने ही परिवार की जरूरतों को नजरअंदाज करने लगता है।
मनोज बाजपेयी फिल्म में एक ऐसे रिटायर्ड स्कूल टीचर और विधुर का किरदार निभा रहे हैं, जो अपनी जिंदगी में खुद को हमेशा परिवार का सही और जिम्मेदार इंसान मानता रहा है। उसे लगता है कि उसने अपने परिवार के लिए बहुत कुछ किया है और जरूरत पड़ने पर हमेशा अपने भाइयों के साथ खड़ा रहा है। लेकिन, जब उसका बेटा उसे उसकी ही सोच का दूसरा पहलू दिखाता है, तो उसके लिए खुद को सही मानने की तस्वीर बदलने लगती है।
आईएएनएस से बात करते हुए मनोज ने कहा, ''मेरा किरदार हर चीज को सही और गलत के नजरिए से देखने का आदी है। उसके लिए किसी भी परिस्थिति को बीच के रास्ते से देखने की गुंजाइश कम है। अगर मेरे किरदार की बैकस्टोरी को समझा जाए तो उसके बारे में कई बातें उसके बेटे के जरिए सामने आती हैं। वह परिवार में हमेशा खुद को अच्छा और दूसरों से बड़ा साबित करने की कोशिश करता रहा है। उसे लगता है कि उसने अपने भाइयों के लिए बहुत कुछ किया है। उनकी मदद करके वह परिवार में अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहा है। यही सोच धीरे-धीरे उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती है।''
मनोज ने कहा, ''अपने परिवार के लिए कुछ करने और खुद को परिवार का 'बड़ा इंसान' समझने की इस कोशिश में वह अपने सबसे करीबी परिवार को ही कहीं पीछे छोड़ देता है। उसे हमेशा लगता है कि उसने अपने भाइयों के लिए इतना कुछ किया है, इसलिए उसके फैसलों और त्याग की कद्र होनी चाहिए। लेकिन जब उसका बेटा उसके सामने यह बात रखता है कि उसकी इस सोच और व्यवहार का असर उसके अपने परिवार पर भी पड़ा है, तो उसके अंदर की पूरी तस्वीर हिल जाती है।''
उन्होंने कहा, ''उस वक्त मेरे किरदार को एहसास होता है कि जिस काम को वह इतने समय से अपनी सबसे बड़ी अच्छाई मानता आया था, वही उसके आसपास के लोगों के लिए परेशानी की वजह भी बन रहा था। कई बार हम अपनी ही अच्छाई या महानता के इतने आदी हो जाते हैं कि यह देखना बंद कर देते हैं कि हमारी वही 'महानता' दूसरों के लिए किस तरह मुश्किलें पैदा कर रही है।''
उन्होंने कहा, ''इंसान अक्सर अपने किए हुए कामों को एक खास नजरिए से देखता है और खुद को सही साबित करने की कोशिश करता रहता है। असल चुनौती खुद को समझने की होती है। मेरे किरदार के साथ भी कुछ ऐसा ही होता है, जहां उसे अपनी सोच और अपने फैसलों को एक अलग नजरिए से देखने का मौका मिलता है।''
'लास्ट मैन इन टावर' अरविंद अडिगा के इसी नाम के नॉवेल पर आधारित है। फिल्म की कहानी तेजी से बदलती मुंबई की पृष्ठभूमि में सेट है। इसमें मनोज के किरदार की जिंदगी तब बदल जाती है, जब एक बड़ा बिल्डर उस पुरानी इमारत के सभी लोगों को अच्छी रकम देकर घर खाली करने का ऑफर देता है। ज्यादातर लोग इस ऑफर को स्वीकार करने के लिए तैयार हो जाते हैं, क्योंकि इसके बदले उन्हें बड़ी रकम मिल रही होती है।
लेकिन मनोज का किरदार अपना घर छोड़ने से साफ इनकार कर देता है। इसके बाद वह पूरी बिल्डिंग को खाली कराने और वहां लग्जरी टावर बनाने की योजना के बीच अकेली बड़ी रुकावट बन जाता है। कहानी सिर्फ घर बचाने की लड़ाई तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसके जरिए परिवार, रिश्तों, पैसे, सोच और इंसान के अपने बारे में बनाए नजरिए को भी दिखाया गया है।














