नई दिल्ली। हर वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष भी सोमवार को धूमधाम से हिंदी दिवस मनाया गया। वैश्विक स्तर पर हिंदी, तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। हिंदी, सांस्कृतिक और जमीन से जुड़ी ऐसी भाषा है, जिसने कई स्थानीय भाषाओं को खुद में समाहित किया हुआ है। इस खास मौके पर आईएएनएस ने लेखक शैलेश भारतवासी से विशेष बातचीत की।आईएएनएस से बातचीत करते हुए क्लासिक और आधुनिक हिंदी के बारे में लेखक शैलेश भारतवासी ने कहा, "हिंदी बनाम अंग्रेजी की कोई बहस नहीं है। मेरा मानना है कि पिछले 12-15 वर्षों में जब से इंटरनेट तकनीक, विशेषकर देवनागरी से संबंध देखा जाए और यूनिकोड का 25-26 वर्ष पुराना इतिहास देखा जाए तो हिंदी को इंटरनेट और कंप्यूटर पर बहुत ज्यादा प्रचारित किया गया है। कंप्यूटर पर देशी भाषाओं की गति कई हजार गुना बढ़ी है।"

शुद्ध हिंदी पर बात करते हुए उन्होंने कहा, "आज के दौर में अगर कोई प्रचलित भाषा, दूसरी भाषाओं से शब्द नहीं लेगी तो वह खुद को एक खोल में बंद करती जाएगी। यह भाषा के प्रसार के लिए बड़ी चुनौती है। बिना संक्रमण के दूसरी भाषाओं के शब्द ही नहीं, वाक्य विन्यास और शैली में जब तक एक दूसरे में अंतर निहित नहीं होंगे, कोई भी भाषा अपने आप को बचा नहीं सकती। वहीं, शुद्ध हिंदी है जो एक-दूसरे के बीच बोली जा रही है।"

हिंदी साहित्य में 'गाली' को संवाद की तरह प्रयोग करने पर शैलेश भारतवासी का कहना है कि गाली दुनिया के हर समाज का हिस्सा रही है। इसका कोई शास्त्रीय आधार नहीं होता और इसका स्वरूप भी शास्त्रीयता से बिल्कुल अलग है। चूंकि साहित्य हमेशा आम जनता का पक्षधर रहा है, इसलिए इसमें अमूमन उसी भाषा का प्रयोग किया जाता है जो आम बोलचाल की है। ऐसे में साहित्य में गाली का होना एक सामान्य बात है, जिसकी सीमा को कोई अकेला तय नहीं कर सकता। हां, कुछ संस्थान और विशेषकर शैक्षणिक संस्थान इसे जरूर नियंत्रित कर सकते हैं क्योंकि उन्होंने अपनी एक शास्त्रीय सीमा तय कर रखी है।

उन्होंने आगे कहा कि मेरा मानना है कि सिनेमा की तुलना में साहित्य में गाली फिर भी कम है। सिनेमा में गाली ज्यादा है। हर चीज को लोकतांत्रिक किया जा रहा है, तो भाषाई सुचितापन भी लोकतांत्रिक हुआ है। लोग जैसा चाहते हैं, वैसा व्यवहार में हो रहा है। शैलेश ने आगे कहा, "नई हिंदी को जन्मे 13-14 वर्ष हो गए हैं, वह अब अपने किशोरावस्था में है।"