नई दिल्ली। हममें से ज्यादातर लोग केज-फ्री या फ्री-रेंज तरीके से तैयार किए गए अंडे को हर लिहाज से बेहतर मानते हैं, लेकिन एक नई स्टडी में इसको लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। नई रिसर्च में सामने आया है कि मुर्गियों के बेहतर जीवन के लिए अपनाए जाने वाले ये तरीके पर्यावरण पर अतिरिक्त बोझ डाल सकते हैं। जहां एक तरफ पशु कल्याण को बढ़ावा मिलता है, वहीं दूसरी तरफ ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन और जमीन की जरूरत बढ़ सकती है।यह अध्ययन ब्रिटेन (यूके) के आंकड़ों पर आधारित है। शोधकर्ताओं ने अंडा उत्पादन के कई अलग-अलग मॉडल की तुलना की। इसमें पारंपरिक केज सिस्टम, बार्न सिस्टम, फ्री-रेंज और ऑर्गेनिक फार्मिंग शामिल थे। अध्ययन के दौरान यह ध्यान रखा गया कि सभी परिस्थितियों में अंडों का उत्पादन समान रहे, ताकि निष्कर्ष निष्पक्ष हों।

रिसर्च में पाया गया कि यदि पूरी तरह से फ्री-रेंज और ऑर्गेनिक तरीके से अंडों का उत्पादन किया जाए, तो मौजूदा व्यवस्था की तुलना में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन लगभग 60 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। इतना ही नहीं, इसके लिए लगभग दोगुनी जमीन की भी जरूरत पड़ेगी।

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के स्मिथ स्कूल ऑफ एंटरप्राइज एंड द एनवायरमेंट की वरिष्ठ शोधकर्ता डॉ. हैरियट बार्टलेट ने कहा कि भविष्य की अंडा उत्पादन व्यवस्था तय करते समय केवल पशु कल्याण को ही नहीं, बल्कि पर्यावरण और खाद्य उत्पादन—तीनों पहलुओं को साथ लेकर चलना होगा। उनके मुताबिक, इन जटिल संतुलनों को समझना ही बेहतर और टिकाऊ फैसले लेने की कुंजी है।

शोध के प्रमुख लेखक और क्रोएशिया के स्वतंत्र शोधकर्ता ओलिवर मार्टिनिक का कहना है कि दुनिया भर में पिंजरों में मुर्गियां पालने की व्यवस्था खत्म करने की मांग लगातार बढ़ रही है। इसके पीछे पशु अधिकारों और उनके बेहतर जीवन की चिंता है, जो पूरी तरह उचित भी है। लेकिन यदि बिना सभी पहलुओं पर विचार किए बड़े पैमाने पर बदलाव किए गए, तो इसके कुछ अनचाहे परिणाम भी सामने आ सकते हैं।

रिसर्च बताती है कि दुनिया की पूरी खाद्य आपूर्ति शृंखला मानव गतिविधियों से होने वाले कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 26 प्रतिशत हिस्सा है। इसके अलावा जल स्रोतों में अत्यधिक पोषक तत्व पहुंचने (यूट्रोफिकेशन) की 78 प्रतिशत और मिट्टी के अम्लीकरण (टेरेस्ट्रियल एसिडिफिकेशन) की 32 प्रतिशत समस्या भी खाद्य उत्पादन से जुड़ी है। पिछले 50 वर्षों में दुनिया भर में अंडों का उत्पादन चार गुना बढ़ चुका है, इसलिए इस उद्योग का पर्यावरण पर प्रभाव भी लगातार बढ़ा है।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि पूरी तरह फ्री-रेंज और ऑर्गेनिक सिस्टम में मुर्गियों की मृत्यु दर अपेक्षाकृत अधिक रही। हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी स्वीकार किया कि इस अध्ययन में इस्तेमाल किए गए आंकड़े वर्ष 2009-10 के हैं। तब से खेती और पशुपालन की तकनीकों में काफी सुधार हुआ है। इसके बावजूद ये आंकड़े अभी भी यूके की लेयर मुर्गी उत्पादन प्रणाली पर उपलब्ध सबसे व्यापक और विश्वसनीय डेटा माने जाते हैं।