न्यूयॉर्क। बांग्लादेश के अधिकारियों पर बुधवार को अमेरिका स्थित प्रमुख मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच (एचआरडब्ल्यू) ने आरोप लगाया कि वे देश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (आईसीटी) में अंतरराष्ट्रीय कानूनी मानकों का पालन करने में नाकाम रहे हैं।संगठन ने चेतावनी दी कि ऐसी कमियां पीड़ितों को न्याय मिलने से रोक सकती हैं, कानून के शासन को कमजोर कर सकती हैं और राजनीतिक विरोधियों को गलत तरीके से जेल भेजे जाने का कारण बन सकती हैं।
यह टिप्पणी उस समय आई जब सोमवार को आईसीटी के अभियोजन पक्ष ने पूर्व बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीना और 40 अन्य लोगों के खिलाफ मानवता के विरुद्ध अपराधों के एक मामले में औपचारिक आरोप दाखिल किए। यह मामला 2013 में ढाका के शापला चत्तर में हुई हिफाजत-ए-इस्लाम रैली पर कार्रवाई से जुड़ा है।
एचआरडब्ल्यू की उप एशिया निदेशक मीनाक्षी गांगुली ने कहा, “शेख हसीना सरकार के दौरान हुए कई कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। लेकिन कई मामलों में मुकदमे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निष्पक्ष सुनवाई के मानकों पर खरे नहीं उतर रहे हैं। बांग्लादेश को अपने आपराधिक न्याय तंत्र में तुरंत सुधार करने की जरूरत है। नई सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि खराब जांच और मनमाने आरोपों के जरिए राजनीतिक बदले की भावना को बढ़ावा न मिले।”
यह ट्रिब्यूनल मार्च 2010 में शेख हसीना के नेतृत्व वाली आवामी लीग सरकार ने बनाया था। इसका उद्देश्य उन लोगों पर मुकदमा चलाना था जिन पर 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान पाकिस्तान सेना का साथ देते हुए मानवता के विरुद्ध अपराध जैसे अंतरराष्ट्रीय अपराध करने के आरोप थे।
2024 में जब विरोध प्रदर्शनों के बाद आवामी लीग सरकार सत्ता से बाहर हो गई, तब मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने ट्रिब्यूनल से जुड़े कानून में संशोधन किए और अपराधों की परिभाषा में बदलाव किया। हालांकि, एचआरडब्ल्यू के अनुसार, ये बदलाव भी उचित कानूनी प्रक्रिया और अंतरराष्ट्रीय अदालतों जैसी प्रक्रियागत सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
फरवरी 2026 में सत्ता में आई बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की सरकार ने भी उन संशोधनों में कोई बदलाव नहीं किया है।
एचआरडब्ल्यू ने कहा कि ट्रिब्यूनल से जुड़ा कानून अभियोजकों को बिना पर्याप्त सबूतों की शुरुआती सीमा पूरी किए किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी मांगने की अनुमति देता है। साथ ही, लोगों को कई महीनों तक हिरासत में रखा जा सकता है। हिरासत में लिए गए लोगों को किसी अलग अदालत में अंतरिम अपील करने का अधिकार भी नहीं मिलता।
संगठन ने कहा, “अभियोजन पक्ष की ओर से सबूत साझा किए जाने के सिर्फ तीन हफ्ते बाद ही मुकदमे की सुनवाई शुरू हो सकती है, जिससे बचाव पक्ष को तैयारी के लिए बहुत कम समय मिलता है। अनुपस्थिति में चलने वाले मुकदमों में भी पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं हैं, जैसे कि आरोपी को अपनी पसंद का वकील चुनने का अधिकार। इसके अलावा ट्रिब्यूनल बचाव पक्ष के वकीलों की गवाहों से जिरह करने की क्षमता को भी सीमित करता है।”
एचआरडब्ल्यू ने बताया कि 27 जुलाई को अभियोजकों ने दो पत्रकारों सहित कुल 41 लोगों के खिलाफ ट्रिब्यूनल में आरोप दाखिल किए, जिनमें मानवता के विरुद्ध अपराध और नरसंहार के आरोप शामिल हैं।
मानवाधिकार संगठन ने आरोप लगाया कि ट्रिब्यूनल के अभियोजक और न्यायाधीश जांच अधिकारियों की ओर से दर्ज किए गए ऐसे बयानों पर भरोसा कर रहे हैं जिनके कई हिस्से अलग-अलग गवाहों के बयानों में हूबहू दोहराए गए हैं। इससे इन बयानों की विश्वसनीयता और प्रामाणिकता पर सवाल उठते हैं।




