नई दिल्ली। भारत और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (ईएफटीए) देशों के बीच हुए व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौते (टीईपीए) के लागू होने के बाद भारत और आइसलैंड के संबंधों में उल्लेखनीय मजबूती आई है। यह बात नई दिल्ली में आइसलैंड के राजदूत बेनेडिक्ट होस्कुल्डसन ने बुधवार को न्यूज एजेंसी आईएएनएस को दिए एक विशेष साक्षात्कार में कही। उन्होंने कहा कि यह समझौता दोनों देशों के बीच बढ़ते संबंधों का मजबूत आधार बन गया है।राजदूत ने कहा कि पिछले वर्ष अक्टूबर में भारत-ईएफटीए समझौता लागू होने के बाद आइसलैंड ने भारत में अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को बढ़ावा देने के लिए कई पहलें की हैं। उनके अनुसार, टीईपीए ने दोनों देशों के बीच सहयोग के नए अवसर खोले हैं और यह संबंधों को दीर्घकालिक आधार प्रदान करता है।
उन्होंने कहा, "मेरा मानना है कि टीईपीए वास्तव में हमारे दोनों देशों के बीच बढ़ते संबंधों को मजबूती से स्थापित करता है।"
होस्कुल्डसन ने बताया कि समझौते के लागू होने के बाद आइसलैंड ने भारत के तीन अलग-अलग शहरों में कार्यशालाओं का आयोजन किया, जिनका उद्देश्य दोनों देशों के बीच पर्यटन को बढ़ावा देना था। इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि दिल्ली में आइसलैंडिक समुद्री खाद्य उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया था, जिससे व्यापारिक अवसरों को बढ़ावा मिला है। इसके अतिरिक्त आइसलैंड से भारत के समुद्री क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण निवेश भी किया गया है।
राजदूत के अनुसार, आइसलैंड भारत को आने वाले वर्षों में तेजी से विकसित होने वाला बाजार मानता है और एशिया में उसकी रणनीतिक गतिविधियों में भारत की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जाएगी।
उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में भारत ने उल्लेखनीय आर्थिक और तकनीकी प्रगति की है। इसी कारण विश्व स्तर पर भारत का आर्थिक और भू-राजनीतिक महत्व लगातार बढ़ रहा है और आइसलैंड इस परिवर्तन को निकटता से देख रहा है।
जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में सहयोग पर चर्चा करते हुए होस्कुल्डसन ने कहा कि भारत और आइसलैंड दो महत्वपूर्ण क्षेत्रों में मिलकर काम कर रहे हैं।
पहला क्षेत्र भू-तापीय ऊर्जा है। उन्होंने बताया कि आइसलैंड को इस क्षेत्र में लगभग 100 वर्षों का अनुभव है। उच्च तापमान वाले भू-तापीय संसाधनों से बिजली उत्पादन के अलावा कम तापमान वाले संसाधनों का उपयोग भी किया जा सकता है, जिससे विशेष रूप से भारत के उत्तरी और हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को लाभ मिल सकता है।
दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण (सीसीयूएस) है। राजदूत ने आईएएनएस कहा कि आइसलैंड पिछले दो दशकों से अधिक समय से इस तकनीक का व्यावसायिक उपयोग कर रहा है और अब इन तकनीकों को भारत में भी लाने की प्रक्रिया चल रही है।
उन्होंने आईएएनएस को बताया कि भारत के उन उद्योगों के लिए यह तकनीक विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है, जिनमें उत्सर्जन कम करना चुनौतीपूर्ण माना जाता है। इसमें इस्पात, पेट्रोकेमिकल और सीमेंट जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
होस्कुल्डसन ने आगे कहा कि भारत के विकास को देखते हुए इन उद्योगों का विस्तार जारी रहेगा, लेकिन साथ ही इनके कार्बन उत्सर्जन को कम करना भी आवश्यक है। सीसीयूएस तकनीक इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
उन्होंने बताया कि वर्तमान उपलब्ध तकनीकों के माध्यम से कार्बन डाइऑक्साइड को भूमिगत बेसाल्ट चट्टानों में सुरक्षित रूप से संग्रहित किया जा सकता है। इसके अलावा, सीओ2 और हाइड्रोजन को मिलाकर ई-मेथेनॉल तैयार किया जा सकता है, जिसे भविष्य में विमानन ईंधन के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।














