लखनऊ। उत्तर प्रदेश में करीब डेढ़ दशक बाद होने जा रही जनगणना (Census) को लेकर प्रशासनिक तैयारियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं। हालांकि, इस बार का घटनाक्रम केवल आबादी के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। जनगणना का दूसरा चरण ऐसे समय में प्रस्तावित है, जब अगले साल उत्तर प्रदेश सहित देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव आयोजित होने हैं। ऐसे में प्रशासनिक हलकों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक यह चर्चा जोरों पर है कि जनगणना और चुनावी कैलेंडर के बीच तालमेल कैसे बैठाया जाएगा।
जनगणना और चुनावी कैलेंडर आमने-सामने
जनगणना और आगामी चुनावों की स्थिति कुछ इस प्रकार है:
जनगणना का चरणबद्ध काम: पहला चरण (मकान सूचीकरण और बुनियादी सुविधाएं) पूरा हो चुका है। दूसरे चरण में मुख्य जनसांख्यिकी और पहली बार जातीय गणना (Caste Census) का डेटा एकत्र किया जाना है।
5 राज्यों में चुनाव: उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर की विधानसभाओं का कार्यकाल अगले साल मार्च से मई के बीच समाप्त हो रहा है। संभावना है कि चुनाव आयोग इन राज्यों में फरवरी-मार्च 2027 के दौरान एक साथ चुनाव कराए।
कर्मचारियों की भारी कमी की चुनौती: केवल उत्तर प्रदेश में ही जनगणना के कार्य के लिए करीब 5.5 लाख कर्मचारियों (विशेषकर शिक्षकों) की आवश्यकता पड़ती है। चुनाव ड्यूटी, यूपी बोर्ड परीक्षाओं और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के बीच इतने बड़े स्तर पर मानव संसाधन जुटाना एक बड़ी चुनौती है।
नवंबर-दिसंबर का विकल्प और राजनीतिक समीकरण
प्रशासनिक स्तर पर विचार चल रहा है कि यदि चुनाव आयोग की आधिकारिक घोषणा से पहले पर्याप्त समय मिल जाता है, तो जनगणना का दूसरा चरण नवंबर या दिसंबर में ही पूरा करा लिया जाए, ताकि प्रशिक्षण और डेटा संग्रहण का काम समय पर निपटाया जा सके।
परिसीमन और भविष्य की राजनीति पर प्रभाव:
मौजूदा सीटों पर ही होंगे चुनाव: राजनीतिक विश्लेषकों ने स्पष्ट किया है कि आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव मौजूदा निर्वाचन क्षेत्रों (Current Boundaries) के आधार पर ही लड़े जाएंगे।
जातीय गणना के मायने: जातीय गणना के नए आंकड़े भविष्य में परिसीमन (Delimitation), आरक्षण नीतियों, संसाधनों के न्यायसंगत आवंटन और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में दूरगामी भूमिका निभाएंगे।
स्थिति अभी क्या है?
चुनाव आयोग और राज्य प्रशासन दोनों ही प्रक्रियाओं के बीच संतुलन बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि जनगणना की तिथियों को चुनावों से पहले समेटा जाएगा या फिर चुनाव आयोग के अंतिम कार्यक्रम के अनुसार इसमें बदलाव किया जाएगा।




