नई दिल्ली। हिंदू सनातन परंपरा में पितृ पक्ष का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है। श्राद्ध पक्ष के दौरान श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके निमित्त तर्पण, पिंडदान एवं विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। देशभर में कई तीर्थस्थल श्राद्ध और तर्पण के लिए प्रसिद्ध हैं, लेकिन राजस्थान के पुष्कर को पितृ कर्म के लिए विशेष तीर्थ माना जाता है। मान्यता है कि यहां श्रद्धालु अपने 7 कुलों और 5 पीढ़ियों तक के पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध कर्म कर सकते हैं।तीर्थ गुरु पुष्कर धार्मिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भारत के प्रमुख तीर्थस्थलों में शामिल है। पुष्कर की सबसे बड़ी विशेषताओं में यहां स्थित जगत पिता भगवान ब्रह्मा का मंदिर है। हिंदू मान्यता में भगवान ब्रह्मा को सृष्टि का रचयिता माना जाता है और पुष्कर में स्थित उनका मंदिर देश-दुनिया से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख आस्था केंद्र है।
पुष्कर की धार्मिक महत्ता केवल ब्रह्मा मंदिर तक सीमित नहीं है। पुष्कर सरोवर के किनारे पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। मान्यता के अनुसार, यहां श्रद्धा के साथ किए गए श्राद्ध और तर्पण से पितरों को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
पुष्कर के तीर्थ पुरोहितों के पास देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले श्रद्धालुओं और उनके पूर्वजों की पोथियां भी सुरक्षित रहती हैं। इन पोथियों में परिवार और पूर्वजों से संबंधित नाम एवं विवरण दर्ज होने की परंपरा बताई जाती है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े तीर्थ पुरोहित यहां आने वाले श्रद्धालुओं की परंपरा और मान्यता के अनुसार श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान तथा पितृ शांति के अनुष्ठान करवाते हैं।
पुष्कर में 7 कुल और 5 पीढ़ियों तक के पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध करने की परंपरा है, जबकि देश में अन्य तीर्थ स्थलों पर एक या दो पीढ़ी तक के पूर्वजों के लिए श्राद्ध किए जाते हैं। भगवान श्रीराम ने भी पुष्कर में अपने 7 कुल और 5 पीढ़ियों के पूर्वजों का उद्धार यहां श्राद्ध करके किया था। पुष्कर जगत पिता ब्रम्हा की नगरी है। वहीं पवित्र पुष्कर सरोवर के जल को नारायण के रूप में पूजा जाता है। यहां श्रद्धा के साथ पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
पुष्कर में श्राद्ध कर्म को लेकर धार्मिक कथाएं भी प्रचलित हैं। तीर्थ पुरोहितों के अनुसार, भगवान श्रीराम ने भी पुष्कर में अपने पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध कर्म किया था। एक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ पुष्कर आए थे और उन्होंने अपने पिता महाराज दशरथ का श्राद्ध किया। इसके बाद राजा दशरथ ने उन्हें आशीर्वाद दिया। इसी धार्मिक परंपरा और मान्यता के कारण पुष्कर को पितृ कर्म के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
पुष्कर सरोवर 52 घाटों से घिरा हुआ है। यहां श्रद्धालु स्नान, पूजा, तर्पण और अन्य धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार पुष्कर सरोवर में स्नान करने से आध्यात्मिक शुद्धता प्राप्त होती है। पितृ पक्ष के दौरान सरोवर के घाटों पर श्रद्धालुओं की विशेष चहल-पहल रहती है।
इसके साथ ही पुष्कर स्थित गया कुंड का भी विशेष महत्व है। मान्यता है कि जो गया (बिहार) जाकर अपने पितरों का श्राद्ध नहीं कर सकता, वह पुष्कर के गया कुंड में श्राद्ध कर सकता है। सदियों से श्रद्धालु पुष्कर में जगतपिता ब्रह्मा के दर्शनों के लिए आते रहे हैं। यहां आने पर श्रद्धालु अपने पूर्वजों के नियमित तर्पण और पिंडदान करवाना नहीं भूलते हैं। कहा जाता है कि श्राद्ध पक्ष के पखवाड़े में शुभ कार्य करना वर्जित माना गया है।
पितृ पक्ष के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु पुष्कर पहुंचते हैं। मंत्रोच्चार, वैदिक कर्मकांड और पुष्कर सरोवर के घाटों पर होने वाले तर्पण के बीच पूरा वातावरण धार्मिक दिखाई देता है। यही धार्मिक परंपराएं पुष्कर को श्राद्ध और पितृ कर्म के प्रमुख तीर्थस्थलों में विशेष पहचान दिलाती हैं।














