भोपाल। मध्य प्रदेश में मौसम और पर्यावरण को लेकर एक बेहद चिंताजनक रिपोर्ट सामने आई है। द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (TERI) और इंस्टीट्यूट फॉर गवर्नेंस एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट (IGSD) द्वारा संयुक्त रूप से जारी रिपोर्ट ‘नॉन-सीओ2 एमिशन रिडक्शन पाथवेज फॉर मध्य प्रदेश: ए मल्टी-सेक्टोरल असेसमेंट’ में खुलासा हुआ है कि यदि वर्तमान स्थिति जारी रही, तो आने वाले दशकों में प्रदेश के तापमान में भारी बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। वर्ष 2019 को आधार मानकर तैयार की गई इस रिपोर्ट में 2030, 2040 और 2047 तक के गंभीर पर्यावरणीय संकेत दिए गए हैं।
2030 तक तापमान में बढ़ोतरी का अनुमान
- रिपोर्ट के अनुसार, 2030 के दशक तक मध्य प्रदेश के तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि हो सकती है:
- दिन का अधिकतम तापमान: 1.8 से 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने का अनुमान है।
- रात का न्यूनतम तापमान: 2 से 2.4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है।
प्रदेश के सबसे संवेदनशील जिले और शहरों की चुनौतियां
पर्यावरणीय बदलावों और प्रदूषण के आधार पर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग खतरे चिह्नित किए गए हैं: डिंडोरी, भिंड और सीधी जिलों में गर्मी झेलने की क्षमता सबसे कम है, जिसके चलते इन्हें सबसे संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। कोयला खदानों से निकलने वाली मीथेन गैस और ताप विद्युत गृहों का धुआं हवा को अत्यधिक दूषित कर रहा है। यहां वाहनों का दबाव, औद्योगिक उत्सर्जन और कचरे के ढेरों से निकलने वाली मीथेन गैस प्रमुख समस्या है। इंदौर नगर निगम देश का पहला निगम है जिसने कार्बन क्रेडिट से करीब ₹50 लाख कमाए हैं (सालाना 1.70 लाख टन CO2 के बराबर क्रेडिट बिक्री)। इसके बावजूद यहां कचरे से मीथेन का उत्सर्जन अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। सागर, मुरैना, रीवा, खरगोन और छिंदवाड़ा जिलों में पशुधन की अधिकता के कारण मीथेन उत्सर्जन का स्तर काफी ऊंचा है।
प्रदूषण के चार मुख्य कारण
अध्ययन में पाया गया कि प्रदेश में नॉन-CO2 गैसों के उत्सर्जन के पीछे निम्नलिखित मुख्य कारण हैं: वर्ष 2019 में प्रदेश में उत्सर्जित कुल 8.43 लाख टन मीथेन का 60% हिस्सा अकेले पशुपालन क्षेत्र से आया। खेतों में पराली जलाने से कुल ब्लैक कार्बन का 47% हिस्सा उत्सर्जित होता है, जिससे हवा में PM2.5 और PM10 का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ता है। प्रदेश में कुल नाइट्रोजन ऑक्साइड उत्सर्जन का 92% हिस्सा बिजली संयंत्रों और वाहनों से निकलता है। ग्रामीण व अर्ध-शहरी क्षेत्रों में लकड़ी और जैव ईंधन (बायोमास) के इस्तेमाल से 49% गैसीय प्रदूषण होता है। एलपीजी के सीमित उपयोग से यह समस्या बढ़ रही है।
रिपोर्ट में सुझाए गए प्रमुख समाधान
पर्यावरण विशेषज्ञों ने इस संकट से निपटने के लिए क्षेत्रवार कई ठोस उपाय प्रस्तुत किए हैं: बेहतर पशु आहार देने से मीथेन उत्सर्जन में 10 से 15% की कमी लाई जा सकती है। वहीं, धान के खेतों में रुक-रुक कर सिंचाई (Alternate Wetting and Drying) करने से मीथेन में 65% तक की गिरावट संभव है। 2030 तक पराली जलाने पर पूर्ण प्रतिबंध का सुझाव दिया गया है। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर में पुरानी गाड़ियों को हटाकर इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) को बढ़ावा देने और गीले कचरे से बायोगैस बनाने की सिफारिश की गई है। एलपीजी कवरेज बढ़ाने और सस्ते सौर चूल्हों को बढ़ावा देने से घरेलू गैसीय प्रदूषण को 80% तक कम किया जा सकता है। बिजली उत्पादन में कोयले पर निर्भरता घटाकर और खदानों से निकलने वाली मीथेन गैस को कैप्चर कर इस्तेमाल में लाने से नाइट्रोजन ऑक्साइड उत्सर्जन में 91% तक की कमी प्राप्त की जा सकती है।




