उज्जैन। विश्व प्रसिद्ध द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक भगवान श्री महाकालेश्वर मंदिर में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि पर 7 अक्टूबर 2026 को तड़के भस्म आरती का दिव्य आयोजन हुआ। ब्रह्म मुहूर्त में बाबा महाकाल के अलौकिक दर्शन के लिए मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। पूरा महाकाल परिसर 'जय श्री महाकाल' और 'हर हर महादेव' के जयकारों से गूंज उठा।
परंपरा के अनुसार भस्म आरती से पहले भगवान वीरभद्र की आज्ञा ली गई। इसके बाद ढोल-नगाड़ों और शंखनाद के साथ मंदिर के कपाट खोले गए। पट खुलते ही गर्भगृह में पुजारी-पुरोहितों ने विधि-विधान से पूजन शुरू किया। सबसे पहले प्रथम घंटाल बजाकर बाबा महाकाल को हरिओम जल अर्पित किया गया।
इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से बने पंचामृत से भगवान का पवित्र अभिषेक किया गया। अभिषेक के बाद बाबा का विशेष श्रृंगार किया गया। पुजारियों ने महाकाल को भगवान गणेश के स्वरूप में सजाया, जो भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहा। बाबा महाकाल को भांग, चंदन, सिंदूर, मेवों और आभूषणों से सजाया गया। इसके बाद मोगरे और गुलाब जैसे सुगंधित फूलों की माला पहनाई गई। बाबा महाकाल ने रजत मुकुट धारण किया। श्रृंगार के बाद बाबा को फल, सूखे मेवे और मिष्ठान का भोग लगाया गया।
श्रृंगार के पहले महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से बाबा महाकाल को पवित्र भस्म अर्पित की गई और फिर भस्म आरती शुरू हुई। भस्म रमाने के बाद जैसे ही बाबा महाकाल के दिव्य और साकार रूप के दर्शन हुए, पूरा प्रांगण भक्ति में लीन हो गया। झांझ-मंजीरों, ढोल-नगाड़ों और शंखनाद के बीच हुई इस आरती को देखकर हजारों श्रद्धालु भावविभोर हो उठे और हाथ जोड़कर नतमस्तक हो गए।
महाकाल मंदिर की भस्म आरती की अपनी खास परंपरा है। मान्यता है कि भस्म अर्पित होने के बाद ही बाबा महाकाल निराकार से साकार रूप में अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। यही कारण है कि इस अलौकिक आरती में शामिल होने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु उज्जैन खिंचे चले आते हैं। भस्म आरती के बाद दिनभर मंदिर में दर्शन का सिलसिला जारी रहता है।











