इंदौर | स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) टाइप-2 जैसी बेहद दुर्लभ और जानलेवा बीमारी से जूझ रही साढ़े तीन साल की मासूम बच्ची अनिका के इलाज का मामला अब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की दहलीज पर पहुंच गया है। बच्ची को जीवनदान देने के लिए आवश्यक ₹9 करोड़ की कीमत वाले महंगे इंजेक्शन की व्यवस्था को लेकर दायर याचिका पर हाईकोर्ट में एक बेहद भावुक और महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान वकीलों द्वारा दिए गए एक अनूठे सुझाव पर जस्टिस सुबोध अभ्यंकर की एकल पीठ ने सरकारी वकील से मौखिक टिप्पणी करते हुए पूछा, "क्या यह बच्ची लाड़ली बहना नहीं है?" कोर्ट के इस सवाल पर फिलहाल सरकारी पक्ष की ओर से कोई जवाब नहीं आ सका। मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने सरकार से जवाब तलब किया है।
सवा करोड़ लाड़ली बहनों के कोटे से सिर्फ ₹2 कम करने का अनूठा सुझाव
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता चंचल गुप्ता और एडवोकेट लखन शर्मा ने सुनवाई के दौरान कोर्ट के समक्ष बच्ची की जान बचाने के लिए एक व्यावहारिक और प्रभावी गणित पेश किया।
- वकीलों की दलील: वर्तमान में मध्य प्रदेश सरकार अपनी महत्वाकांक्षी 'लाड़ली बहना योजना' के तहत प्रदेश की लगभग सवा करोड़ महिलाओं को हर महीने ₹1500 की आर्थिक सहायता राशि दे रही है।
- बच सकती है जान: यदि सरकार केवल एक महीने के लिए प्रत्येक लाड़ली बहना की राशि में से मात्र ₹2 (दो रुपए) की कटौती कर ले, तो सीधे ₹2.5 करोड़ से अधिक की राशि एकत्रित हो जाएगी। इस राशि से मासूम बच्ची अनिका को नया जीवन मिल सकता है।
दुनिया की सबसे महंगी दवा, समाज ने जुटाए ₹7 करोड़
द्वारकापुरी क्षेत्र में रहने वाली अनिका जिस बीमारी से पीड़ित है, उसका उपचार केवल 'जोलगेन्स्मा' (Zolgensma) नामक इंजेक्शन से ही संभव है, जिसे दुनिया की सबसे महंगी दवाओं में शुमार किया जाता है। इसकी कुल कीमत ₹9 करोड़ के आसपास है। अनिका के मध्यमवर्गीय परिवार के लिए यह राशि जुटाना असंभव था, लेकिन शहरवासियों, विभिन्न सामाजिक संस्थाओं और देशव्यापी क्राउड फंडिंग (जनसहयोग) के माध्यम से अब तक करीब ₹7 करोड़ की भारी-भरकम राशि एकत्रित की जा चुकी है। अब इंजेक्शन के लिए केवल ₹2 करोड़ की दरकार है, जिसके लिए सरकार से मदद की आस लगाई गई है।
13 किलो वजन की शर्त: तरल आहार पर है मासूम, 22 जून को अगली सुनवाई
समय पर इलाज बेहद जरूरी:
एडवोकेट लखन शर्मा ने कोर्ट को बताया कि इस जानलेवा बीमारी के कारण मासूम अनिका पिछले कई महीनों से सिर्फ तरल आहार (लिक्विड डाइट) पर निर्भर है। इस जीवनरक्षक इंजेक्शन को लगाने की एक अनिवार्य चिकित्सकीय शर्त यह है कि बच्ची का वजन किसी भी सूरत में 13 किलोग्राम से अधिक नहीं होना चाहिए। बढ़ती उम्र के साथ बच्ची का वजन नियंत्रित रखना और उसे 13 किलो से कम बनाए रखना परिवार के लिए इस समय सबसे बड़ी और जानलेवा चुनौती बना हुआ है। यदि वजन बढ़ गया, तो यह इंजेक्शन बेअसर हो जाएगा। बीमारी के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए कोर्ट ने भी मामले में तत्परता दिखाई है। हाईकोर्ट ने मध्य प्रदेश शासन को इस पर अपना आधिकारिक जवाब पेश करने का निर्देश देते हुए मामले की अगली त्वरित सुनवाई के लिए 22 जून की तारीख मुकर्रर की है।


