नई दिल्ली। पशुपालन से निकलने वाले बेहद गंदे और प्रदूषित पानी को साफ करने के लिए आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने प्रकृति आधारित एक नई जल उपचार प्रणाली विकसित की है। खास बात यह है कि इस प्रणाली में अरबी के पौधों का इस्तेमाल किया गया है और इसे चलाने में बहुत कम ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। यह तकनीक खासतौर पर ग्रामीण और संसाधन-सीमित क्षेत्रों के छोटे और मध्यम पशुपालन फार्मों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। इस रिसर्च का मकसद पशुपालन से निकलने वाले अत्यधिक प्रदूषित पानी को प्राकृतिक तरीके से साफ करना और उसे नदियों, झीलों तथा कृषि क्षेत्रों तक पहुंचने से रोकना है। पशुपालन के अलावा कृषि और अन्य ग्रामीण गतिविधियों से दूषित होने वाले पानी के उपचार में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे जल स्रोतों में प्रदूषण कम करने और ग्रामीण क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है।

आईआईटी गुवाहाटी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के अपशिष्ट प्रबंधन अनुसंधान समूह ने यह प्रणाली विकसित की है। इसमें अरबी यानी कोलोकैसिया एस्कुलेंटा के पौधों के साथ विशेष जिग-जैग प्रवाह प्रणाली का इस्तेमाल किया गया है। इस तकनीक की सबसे खास बात इसका जिग-जैग डिजाइन है। शोधकर्ताओं ने उपचार प्रणाली के भीतर विशेष अवरोध लगाए हैं। इससे गंदे पानी को सीधे बाहर निकलने के बजाय लंबे जिग-जैग रास्ते से गुजरना पड़ता है। इस दौरान पानी का संपर्क अरबी के पौधों की जड़ों, लाभकारी सूक्ष्मजीवों और बजरी आधारित माध्यम से अधिक समय तक रहता है। पानी अलग-अलग वायवीय और अल्प-वायवीय अवस्थाओं से होकर गुजरता है। इससे जैविक और रासायनिक उपचार प्रक्रियाओं को बेहतर तरीके से काम करने का मौका मिलता है।

शोध के लिए सूअर पालन से निकलने वाला अपशिष्ट जल असम स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय शूकर अनुसंधान केंद्र से लिया गया था। यह काम आईआईटी गुवाहाटी के साथ अनुसंधान एवं विकास सहयोग के तहत किया गया। प्रयोगों में इस प्रणाली ने प्रदूषकों को कम करने में उल्लेखनीय परिणाम दिखाए। पानी में मौजूद कुल कोलीफॉर्म की मात्रा करीब 60,000 से घटकर 1,200 एमपीएन प्रति 100 मिलीलीटर रह गई। वहीं ई. कोलाई का स्तर लगभग 2,200 से घटकर 350 एमपीएन प्रति 100 मिलीलीटर हो गया। प्रणाली ने कार्बनिक प्रदूषकों, पोषक तत्वों, निलंबित ठोस पदार्थों, धातुओं और हानिकारक सूक्ष्मजीवों की मात्रा में भी कमी की। यानी एक ही प्रणाली में कई तरह के प्रदूषकों को कम करने की क्षमता दिखाई दी।

दिलचस्प बात यह रही कि जिस अरबी का इस्तेमाल पानी साफ करने के लिए किया गया, उसकी वृद्धि भी अच्छी हुई। अध्ययन के दौरान पौधों की लंबाई करीब दोगुनी हो गई, जबकि उनका जैवभार चार गुना से अधिक बढ़ गया। शोधकर्ताओं ने केवल पानी में मौजूद प्रदूषकों की मात्रा ही नहीं मापी, बल्कि यह भी जांचा कि उपचार के बाद पानी जीवित प्राणियों के लिए कितना हानिकारक रह जाता है। इसके लिए उन्होंने प्याज आधारित जैव-परीक्षण का इस्तेमाल किया। परिणामों में उपचार के बाद पानी के विषाक्त प्रभाव में महत्वपूर्ण कमी सामने आई। यानी इस प्रणाली ने केवल प्रदूषकों की सांद्रता कम करने का काम नहीं किया, बल्कि पानी के दोबारा इस्तेमाल से जुड़े जैविक जोखिम को भी घटाया।

आईआईटी गुवाहाटी प्रोफेसर अजय एस. कलामधद ने बताया कि शोध का उद्देश्य केवल प्रदूषण के संकेतकों को कम करना नहीं था, बल्कि अपशिष्ट जल को पर्यावरण के लिए जैविक रूप से अधिक सुरक्षित बनाना भी था। उनके मुताबिक, इस प्रणाली में पानी के प्रवाह को इंजीनियरिंग के जरिए नियंत्रित करते हुए पौधों और सूक्ष्मजीवों की प्राकृतिक उपचार क्षमता का इस्तेमाल किया गया है। आईआईटी गुवाहाटी शोधार्थी मोनिश गोस्वामी ने बताया कि पारंपरिक प्रणालियों के विपरीत इस प्रणाली में आंतरिक अवरोध लगाए गए हैं। इनके कारण पानी लंबा रास्ता तय करता है और पौधों की जड़ों, सूक्ष्मजीवों तथा बजरी आधारित माध्यम के संपर्क में अधिक समय बिताता है।

इस तकनीक की खासियत इसका छोटा आकार, कम ऊर्जा खपत और कम रखरखाव है। इसमें स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पौधों और बजरी आधारित माध्यम का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसलिए ऐसी जगहों पर भी इसे अपनाने की संभावना है, जहां बड़ी और महंगी जल उपचार सुविधाएं बनाना मुश्किल है। इस शोध के निष्कर्ष जर्नल ऑफ एनवायर्नमेंटल मैनेजमेंट में प्रकाशित हुए हैं। अब शोधकर्ताओं की अगली चुनौती इस प्रयोगशाला स्तर की तकनीक को बड़े स्तर पर ले जाना है। इसके लिए लंबे समय तक क्षेत्रीय परीक्षण किए जाएंगे, ताकि यह पता लगाया जा सके कि अलग-अलग परिस्थितियों में यह प्रणाली कितनी प्रभावी रहती है। इसका लक्ष्य भविष्य में देश के दूरदराज और विकेंद्रीकृत पशुपालन क्षेत्रों के लिए कम लागत और टिकाऊ अपशिष्ट जल उपचार उपलब्ध कराना है।