अयोध्या। पितृपक्ष के दौरान रामनगरी अयोध्या में सरयू तट एवं तीर्थ स्थलों पर श्राद्ध और पिंडदान शुरू हो गया है। प्रतिवर्ष की तरह इस साल भी लोग अपने-अपने माता-पिता और पूर्वजों के नाम से वार्षिक श्राद्ध कर रहे हैं।पंडित शाहतू लाल ने आईएएनएस को बताया, "अयोध्या में पितृपक्ष का मुख्य महत्व सरयू तट एवं तीर्थ स्थलों में माता-पिता के प्रति श्रद्धा के श्राद्ध से है। इसमें लोग अपने-अपने माता-पिता और पूर्वजों के नाम से वार्षिक श्राद्ध करते हैं। गया में पिंड दान के पश्चात पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह 15 दिन का समय माता-पिता, पितरों और पूर्वजों को ही समर्पित होता है। इस दौरान किया गया दान-धर्म, पिंड दान और श्राद्ध धन-वैभव में वृद्धि करता है।"
पंडित शाहतू लाल ने कहा, "श्राद्ध काल में तीर्थ स्थलों का सबसे बड़ा महत्व होता है। जो लोग गया जाते हैं, उनके लिए पिंड दान का विधान इस प्रकार है। प्रथम पिंड घर पर किया जाता है। द्वितीय पिंड अयोध्या में सरयू तट पर, तृतीय पिंड भरतकुंड, नंदीग्राम, चतुर्थ पिंड बनारस और पंचम पिंड गया में (जहां 45 वेदी हैं) होता है। इसके बाद पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। अयोध्या श्री राम की भूमि है, इसलिए यहां का महत्व अत्यंत विशेष और महान है।"
अयोध्या में अपने पूर्वजों का पिंडदान करना बहुत पुण्य और मोक्षदायक माना जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम की नगरी अयोध्या में पितरों का तर्पण और श्राद्ध करने से उन्हें शांति और मुक्ति मिलती है। पवित्र सरयू नदी के तट पर भरत कुंड है, जहां लोग हिंदू ब्राह्मण पुजारी की अध्यक्षता में अनुष्ठान करने के अपने दायित्व को पूरा करते हैं। एक प्रथा के रूप में लोग अपने पूर्वजों के लिए यहां हवन भी करवाते हैं। परिवार के सदस्य पहले नदी में डुबकी लगाते हैं और फिर अनुष्ठान के लिए बैठते हैं, जिसके बाद वे गरीबों को भिक्षा देते हैं और फिर घर लौट जाते हैं।
भरत कुंड वह स्थान है जो वनवास से लौटे राम और भरत के मिलन का साक्षी रहा। भगवान विष्णु का बाएं पांव का गयाजी में तो दाहिने पांव का चरण चिह्न भरतकुंड में गयावेदी पर है। वनवास से लौटने पर भगवान राम ने अपने पिता राजा दशरथ का तर्पण यहीं किया था। तभी से यहां पिंडदान की परंपरा है। मान्यता है कि भरतकुंड में किया पिंडदान, गया तीर्थ के समान है।














