देवघर। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन शनिवार को झारखंड के देवघर का दौरा करेंगे और वहां के ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) के दूसरे दीक्षांत समारोह को संबोधित करेंगे।उपराष्ट्रपति देवघर के बीबीएमटी अस्पताल में 'सैन्य संपर्क मेला' का भी दौरा करेंगे।
इस सप्ताह की शुरुआत में उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने नई दिल्ली के कुतुब इंस्टीट्यूशनल एरिया में श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के दूसरे दीक्षांत समारोह को संबोधित किया।
उन्होंने 'नशे को न' की शपथ लेने में सभा का नेतृत्व किया और अच्छे नंबरों से पास होने वाले छात्रों को गोल्ड मेडल दिए।
संस्कृत विद्यापीठ से केंद्रीय विश्वविद्यालय बनने तक के विश्वविद्यालय के सफर का जिक्र करते हुए, उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने कहा कि अब समय आ गया है कि यह संस्थान संस्कृत की पढ़ाई के लिए एक बेहतरीन इंटरनेशनल सेंटर के तौर पर अपनी पहचान बनाए और अपने संस्थापक व पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री के विजन को पूरा करे।
पूर्व प्रधानमंत्री शास्त्री को श्रद्धांजलि देते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि उनका मशहूर नारा 'जय जवान, जय किसान' सिर्फ एक नारा नहीं था, बल्कि यह भारत के अपनी सीमाओं की रक्षा करने और फूड सिक्योरिटी पक्की करने के संकल्प को दिखाता था।
उन्होंने एनएएसी से सबसे ऊंचा ग्रेड 'ए प्लस प्लस' पाने और भारतीय ज्ञान परंपरा के अलग-अलग क्षेत्रों में रिसर्च करने के लिए विश्वविद्यालय की तारीफ की।
उन्होंने कहा कि हालांकि हर भारतीय भाषा ने देश को समृद्ध किया है, लेकिन संस्कृत वह 'सुनहरा धागा' है जो भारत की कई भाषाओं के मोतियों को एक शानदार माला में पिरोता है।
उन्होंने कैंपस में 'सुभाषिता' के जरिए संस्कृत को जिंदा रखने, 44 साल पुरानी 'विद्यापीठ पंचांग' छापने की परंपरा और प्राकृत व वास्तु शास्त्र जैसे पारंपरिक विषयों की पढ़ाई कराने की विश्वविद्यालय की कोशिशों की भी तारीफ की।
उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने जोर दिया कि भारत का विकास उसकी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लीडरशिप में कई पहलों ने संस्कृत के पुनरुत्थान और भारतीय ज्ञान प्रणाली को बढ़ावा देने के लिए एक अच्छा माहौल बनाया है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 और 'अष्टादशी' योजना का जिक्र करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि संस्कृत के दुर्लभ ग्रंथों को गायब नहीं होने देना चाहिए, बल्कि उन्हें सुरक्षित रखना चाहिए, उन पर पढ़ाई करनी चाहिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए उपलब्ध कराना चाहिए। भारत की पांडुलिपि विरासत के प्रति विद्वानों की अधिक भागीदारी का आह्वान करते हुए उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन ने विश्वविद्यालय के शिक्षकों और छात्रों से अप्रकाशित संस्कृत पांडुलिपियों की खोज, संरक्षण, आलोचनात्मक संपादन और प्रकाशन का कार्य करने का आग्रह किया।














