मुंबई। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के बढ़ते चलन ने फिल्मों को देखने का तरीका काफी बदल दिया है। अब नई फिल्मों के थिएटर रिलीज के कुछ समय बाद ही उन्हें घर बैठे देखने का ऑप्शन मिल जाता है। इसका असर सिनेमाघरों पर भी दिखाई देता है। हालांकि, देश के अलग-अलग हिस्सों में थिएटर जाने की आदत में काफी फर्क नजर आता है। खासकर साउथ के कई हिस्सों में आज भी लोग फिल्मों को बड़े पर्दे पर देखने के लिए सिनेमाघरों का रुख करते हैं, जबकि नॉर्थ के कई बाजारों में थिएटर जाना पहले की तुलना में कम हुआ है।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इसके पीछे सिर्फ ओटीटी ही वजह नहीं है, बल्कि टिकट की कीमत, थिएटर का माहौल और लोकल ऑडियंस तक सिनेमा की पहुंच भी बड़ी भूमिका निभाती है।
इसी मुद्दे पर बात करते हुए ट्रेड एनालिस्ट गिरीश वानखेड़े ने आईएएनएस को दिए इंटरव्यू में कहा, ''साउथ और हमारे बीच सिर्फ इतना फर्क है कि वहां टिकट की कीमतों का एक स्लैब है। इसका मतलब है कि एक तय कीमत से ज्यादा टिकट नहीं बेचे जा सकते, जबकि नॉर्थ में ऐसी सीमा नहीं है।''
उन्होंने कहा, ''टिकट की कीमतें किफायती रहने की वजह से ज्यादा लोग सिनेमाघरों में फिल्म देखने पहुंचते हैं और कई थिएटरों में नियमित ऑक्यूपेंसी 70 फीसदी से ज्यादा रहती है। साउथ में एसोसिएशन और यूनियन ने भी टिकट की कीमतों को एक सीमा से ज्यादा बढ़ने नहीं दिया है, जबकि नॉर्थ में स्थिति अलग है।''
वहीं, थिएटर इंडस्ट्री से जुड़े विशेक चौहान का मानना है कि सिर्फ टिकट की कीमत ही पूरी तस्वीर नहीं बताती। बिहार के पूर्णिया के चौथी पीढ़ी के थिएटर मालिक विशेक चौहान ने आईएएनएस से कहा कि एग्जीबिशन सेक्टर में बढ़ी कीमतों ने फिल्मों की खपत पर असर डाला है। पहले अगर कोई दर्शक साल में 10-12 फिल्में देखने जाता था, तो अब वह एक या दो फिल्मों के लिए ही थिएटर पहुंचता है।
नॉर्थ और साउथ के टिकट रेट की तुलना करते हुए विशेक चौहान ने कहा, ''चेन्नई और दिल्ली जैसे शहरों के बीच काफी अंतर देखने को मिलता है। दिल्ली में आपको 700 रुपए में टिकट बेचनी पड़ती है और वही चेन्नई में 190 रुपए में टिकट बिकती है।''
उन्होंने कहा, ''आज के कई बड़े मल्टीप्लेक्स खुद को एक प्रीमियम या लाइफस्टाइल एक्सपीरियंस के तौर पर पेश करते हैं। बीडीआर, आइनॉक्स और सिनेपोलिस, ये सभी महंगे है, ऐसे में आम दर्शक इनसे दूरी बनाने लगता है। किसी आम इंसान के पास पैसे होने के बावजूद वह फाइव स्टार होटल में जाने में सहज महसूस नहीं करता, क्योंकि उसे वहां का माहौल अपने लिए नहीं लगता। इसी तरह बहुत महंगे और प्रीमियम थिएटर भी आम दर्शकों को दूर कर सकते हैं। थिएटर इंडस्ट्री को ऐसे स्पेस भी बनाने होंगे जहां आम परिवार आसानी से फिल्म देखने जा सके, क्योंकि असली ऑडियंस वही है।''
विशेक चौहान ने एक दूसरी बड़ी समस्या भी बताई। उन्होंने कहा, ''नॉर्थ इंडिया में दर्शक लंबे समय तक मुख्य रूप से हिंदी फिल्मों पर निर्भर रहे, जबकि साउथ में एक ही इलाके में अलग-अलग भाषाओं की फिल्मों के लिए ऑडियंस मिल जाती है। कर्नाटक जैसे बाजारों में कन्नड़ के साथ तेलुगु, तमिल, मलयालम, हिंदी और हॉलीवुड फिल्मों के लिए भी दर्शक मौजूद हैं। इससे थिएटर बिजनेस को कंटेंट के ज्यादा विकल्प मिलते हैं। ''













