समूची दुनिया पर तीसरे विश्वयुद्ध का खतरा मडराना शुरू हो गया हैं। अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर ताबडतोड हमले शुरू कर दिये हैं। ईरान भी पाकिस्तान जैसे आतंकपरस्त देशों से मिले आन्तरिक समर्थन और गुप्त हथियारों की दम पर जवाबी कार्यवाही कर रहा है। ऐसे में जीवित जीवनियों से लेकर पर्यावरणीय संकट तक की स्थितियां निर्मित हो रहीं है। अमेरिका की गुण्डागिरी तथा धर्म के नाम पर आतंक को फैलाने वाले देशों के मध्य टकराव की स्थितियां अब विस्फोटक होकर अपने परिणाम देने लगीं हैं। विश्व का स्वयंभू सम्राट बनकर मनमानी करने वाले अमेरिका ने अपनी जानकारी की दुहाई देकर पहले वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का अपहरण करवाया और स्वयं ही न्याय करने के सिंहासन पर बैठ गया। अब इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर ताबडतोड हमले कर रहा है जिसमें वहां के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई सहित अनेक प्रमुख लोगों की मौत हो गई है। उसने दुनिया को कभी टैरिफ का भय दिखाया तो कभी सैन्य सामर्थ की दम पर धमकाया। कभी दूसरे देशों के मीरजाफरों को मोहरा बनाकर सत्ता पलट की तो कभी युवाओं को भडका कर अशान्ति फैलाई। कभी धार्मिक मुद्दों को हवा देकर दंगों की आग भडकायी तो कभी मनगढन्त कथानकों के सहारे अन्य देशों को रक्तरंजित किया। कभी अपनी कथित शोध एजेन्सियों की रिपोर्ट को प्रचारित करके संसार की अर्थ व्यवस्था को प्रभावित किया तो कभी दबाव डालकर घातक समझौते करवाये। अमेरिका की गुण्डागिरी और कट्टरपंथी देशों के इस टकराव की चपेट में समूचा संसार आता जा रहा है। ईरान युद्ध में भारत की नीतियां यद्यपि पूरी तरह स्पष्ट है फिर भी कट्टरपंथी और कुटिल राष्ट्र अब मोदी की इजरायल यात्रा, उसके तत्काल बाद हमले और वर्तमान स्थितियों को लेकर निरंतर अफवाहों को हवा दे रहे हैं ताकि विश्वमंच पर चमक बिखेरने वाले इस देश को भी लपेटे में लिया जा सके। अमेरिका के साथ सैन्य समझौते वाले सऊदी अरब, कतर, कुवैत, बहरीन, इराक, सीरिया, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, जार्डन सहित इजरायल पर भी ईरान ने हमले किये हैं। भावी परिणामों की चिन्ता किये बिना ईरान ने संसार के तानाशाह बनने की राह पर सरपट दौड रहे अमेरिका को अपने कट्टरपंथी साथियों के सहारे ललकार दिया है। इस युद्ध में अमेरिका ने सीधा मोर्चा सम्हाला है। उसने अपने षडयंत्र को इजरायल की आक्रामकता के सहारे अंजाम तक पहुंचाना शुरू कर दिया है। इस समूचे घटना क्रम में जिस बात को रेखांकित किया जा रहा है वह है ईरान की उच्चस्तरीय बैठक की सटीक जानकारी, दिन में हमला और एक ही बार में लक्ष्य भेदन का परिणाम। निश्चय ही वहां के उच्चस्तरीय पदों पर प्रतिष्ठित मीरजाफरों ने भितरघात किया है। दुश्मन का साथ देकर अपनों की नस्तनाबूत करवाया है। निजी स्वार्थ के लिए राष्ट्र का सौदा किया है। ऐसे लोगों की समूची दुनिया में भरमार है जो निहित स्वार्थपूर्ति के लालच में कोई भी समझौता करने पर आमादा हो जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि भितरघातियों का हश्र हमेशा ही कष्टप्रद, दुःखद और पीडादायक होता है। उन्हें हमेशा ही किस्तों में कत्ल किया जाता है। ऐसे ही मीरजाफरों ने श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश जैसे राष्ट्रों में अमेरिकी इशारे पर अपने देश को रक्त रंजित किया था। भीड की आड में सत्ता को समाप्त किया और फिर विदेशी आका के इशारे पर उनकी कठपुतली को सर्वमान्य नेता घोषित कर दिया। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि अमेरिका ने तीसरे विश्वयुद्ध का शंखनाद कर दिया है, उसने चारों ओर ने नाकेबंदी करके संसार को बंधक बनाने की चालें चलना शुरू कर दीं हैं। चीन, रूस, भारत, जापान, फ्रांस, इटली, जर्मनी जैसे देशों के चारों ओर शिकंजा कस रखा है। दिखावटी शोभादार दांतों के पीछे छुपी नुकीली दंत-पंक्तियों से भौतिक जगत को चबाने के लिए लालायित अमेरिका का दैत्वरूप अब पूरी तरह उजागर हो चुका है। ऐसे में भारत को सांसारिक घटनाक्रम के साथ-साथ स्वयं के चारों ओर कसते जा रहे नागपाश पर भी ध्यान केन्द्रित करना होगा। पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, चीन जैसे दुश्मनों के साथ अमेरिका के छद्म संबंधों, उनकी तैयारियों और सम्भावित चालों की गहनता से पडताल ही नहीं करना होगी बल्कि उसके लिए जवाबी तैयारियां भी दुरस्त करना होंगी। देश के निरंतर बिगड रहे आन्तरिक हालातों के लिए उत्तरदायी मीरजाफरों की जमातों को चिन्हित करके उनके इतिहास, भूगोल और नागरिक शास्त्र खोजना होंगे, उनके राष्ट्रद्रोही मंसूबों को नस्ताबूत करना होगा और करना होगा उनके आकाओं का सफाया। तभी सनातन का शान्ति संदेश वातावरण में घुल सकेगा। ईमानदाराना बात तो यह है कि दुनिया को अशान्ति की सौगात देने वाले अमेरिका के हाथों में ज्यादातर देशों के मीरजाफरों वाली कुंजी है जिसका उपयोग वह समय-समय पर करता रहता है। इन कुंजियों में अनेक राजनैतिक नेताओं, अधिकारियों सहित न्याय मंदिर के पुजारियों आदि के नाम शामिल है। इस हेतु राष्ट्र के नागरिकों को अपनी धरा के संस्कार, संस्कृति और सम्मान की रक्षा हेतु निरंतर सचेत रहना होगा, सफेदपोशों से लेकर बलशालियों के प्रभाव को निष्प्राण करना होगा और देना होगी स्वार्थपरक सोच को तिलांजलि, तभी संसार में उठ रहे विध्वंशक दावानल से सुरक्षा हो सकेगी। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।
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