भोपाल, जीतेन्द्र यादव। मध्य प्रदेश में आयुष्मान भारत योजना के तहत गरीबों का उपचार करने वाले निजी अस्पतालों और स्वास्थ्य विभाग के बीच का टकराव अब सीधे सड़क पर आ गया है। महीनों से बकाया भुगतान न होने और नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स एंड हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स की अनिवार्य शर्त थोपे जाने के विरोध में बुधवार को राजधानी भोपाल के निजी अस्पतालों के डॉक्टर और संचालक लामबंद हो गए।


प्राइवेट हॉस्पिटल एसोसिएशन के बैनरतले बड़ी संख्या में चिकित्सकों और स्वास्थ्य कर्मियों ने जेपी हॉस्पिटल परिसर स्थित आयुष्मान भारत योजना के राज्य कार्यालय का घेराव कर जोरदार प्रदर्शन और नारेबाजी की। निजी अस्पताल संचालकों ने दो-टूक चेतावनी दी है कि यदि 5-6 महीने से अटका करोड़ों का बकाया तत्काल जारी नहीं किया गया और 1 अक्टूबर से NABH के नाम पर अस्पतालों को बाहर (डी-एम्पैनल) किया गया, तो पूरे मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को ठप कर व्यापक स्तर पर आंदोलन छेड़ा जाएगा।


यह भी पढ़ें:

मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ MP कांग्रेस का उग्र प्रदर्शन:ग्वालियर में बैरिकेड्स तोड़ कलेक्टोरेट में घुसे कांग्रेसी; इंदौर में पुतला दहन और धक्का-मुक्की, देशद्रोह का केस दर्ज करने की मांग


करोड़ों का क्लेम अटका, अस्पतालों में दैनिक संचालन और वेतन संकट

यूनाइटेड प्राइवेट हॉस्पिटल एसोसिएशनके उपाध्यक्ष डॉ. धनंजय मिश्रा ने बताया कि अकेले भोपाल में 468 निजी अस्पताल आयुष्मान योजना से संबद्ध हैं। लगभग हर अस्पताल का औसत 1.5 करोड़ से 2 करोड़ रुपए तक का क्लेम भुगतान सरकार के पास लंबित पड़ा हुआ है। एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि पिछले पांच से छह महीनों से क्लेम की राशि जारी नहीं की गई है, जिसके चलते अस्पतालों के लिए दैनिक संचालन असंभव हो गया है। फंड न होने के कारण दवा वेंडरों का भुगतान अटक गया है और नर्सिंग व तकनीकी स्टाफ को समय पर वेतन नहीं मिल पा रहा है। इस आर्थिक संकट के चलते कई अस्पतालों के सामने वेंटिलेटर, आईसीयू और जरूरी सर्जिकल उपकरणों के मेंटेनेंस का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।


1 अक्टूबर से डी-एम्पैनलमेंट की तैयारी और NABH मानकों पर विरोध

बकाए के अलावा विवाद की दूसरी सबसे बड़ी वजह शासन द्वारा अनिवार्य किया जा रहा NABH प्रमाणीकरण है। स्वास्थ्य विभाग ने संकेत दिए हैं कि बिना पूर्ण NABH सर्टिफिकेट वाले अस्पतालों को 1 अक्टूबर से आयुष्मान नेटवर्क से बाहर (डी-एम्पैनल) करने की कार्रवाई शुरू की जा सकती है। सूत्रों के मुताबिक, भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर के दर्जनों अस्पताल इस कार्रवाई की जद में आ सकते हैं। अस्पताल संचालकों का कहना है कि वे गुणवत्ता सुधार के विरोधी नहीं हैं, लेकिन NABH की जटिल प्रक्रियाओं, भारी-भरकम फीस और कठोर इंफ्रास्ट्रक्चर शर्तों को पूरा करना छोटे और मध्यम अस्पतालों के लिए व्यावहारिक नहीं है। अस्पताल के कुल बेड, ग्रामीण-शहरी क्षेत्र और मौजूदा संसाधनों के आधार पर अलग-अलग मानक तय होने चाहिए, न कि एकतरफा अनिवार्य शर्त।


यह भी पढ़ें:

पन्ना में पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच टकराव:नेतृत्वकर्ता दिव्या अहिरवार और हिसाबी राजपूत को जेल भेजा, पुलिस ने अमित भटनागर को फरार बताया


छोटे अस्पतालों के बाहर होने से गरीब मरीजों के इलाज पर मंडराता संकट

निजी अस्पताल संगठनों ने सरकार की नीति पर गंभीर सवाल उठाते हुए चेताया कि यदि छोटे और मध्यम नर्सिंग होम्स को योजना से बाहर का रास्ता दिखाया गया, तो इसका सीधा खामियाजा उन गरीब और वंचित मरीजों को भुगतना पड़ेगा जो घर के नजदीकी निजी अस्पतालों में कैशलेस इलाज पा रहे हैं। संचालकों ने तीखा सवाल उठाया कि यदि सैकड़ों निजी अस्पताल एक झटके में योजना से बाहर हो गए, तो उन अस्पतालों में भर्ती और भविष्य में आने वाले हजारों गंभीर आयुष्मान मरीजों का भार आखिर कौन संभालेगा? क्या प्रदेश के जर्जर सरकारी अस्पताल और बचे हुए गिने-चुने बड़े कॉर्पेट अस्पताल अचानक बढ़ने वाले मरीजों के इस भारी दबाव को झेलने के लिए तैयार हैं?


आपात बैठक की मांग और प्रदेशव्यापी सेवाएं ठप करने की चेतावनी

निजी अस्पताल संगठनों ने राज्य सरकार और स्वास्थ्य मंत्री से मांग की है कि किसी भी दंडात्मक कार्रवाई या डी-एम्पैनलमेंट से पहले एसोसिएशन के प्रतिनिधियों के साथ उच्चस्तरीय आपात बैठक बुलाई जाए। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि यदि सरकार ने हठधर्मिता दिखाते हुए 1 अक्टूबर को अस्पतालों पर कैंची चलाई, तो प्रदेशभर के समस्त निजी अस्पताल एकजुट होकर योजना के तहत सेवाएं पूरी तरह बंद कर देंगे, जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।


फर्जी बिलिंग और अनियमितताओं के चलते जांच व सख्ती

दूसरी तरफ, स्वास्थ्य विभाग और प्रशासनिक सूत्रों का यह भी तर्क है कि आयुष्मान योजना के दावों (क्लेम) के भुगतान में हो रही देरी और सख्ती के पीछे निजी अस्पतालों द्वारा की जा रही बड़े पैमाने की वित्तीय अनियमितताएं और धांधलियां मुख्य वजह हैं। विभाग को लगातार ऐसी शिकायतें मिलती रही हैं कि कई निजी अस्पताल योजना की आड़ में फर्जीवाड़े का रैकेट चला रहे हैं। जांच में यह बात कई बार उजागर हो चुकी है कि आयुष्मान कार्डधारकों के नाम पर केवल कागजों में मरीजों को भर्ती दिखाकर फर्जी क्लेम बनाए जाते हैं, जबकि हकीकत में मरीज को अस्पताल में दाखिल तक नहीं किया जाता। इसके अलावा, क्लेम की रकम बढ़ाने के लिए मरीजों को डराकर गैर-जरूरी सर्जरी, फर्जी पैथोलॉजी जांचें और महंगे आईसीयू चार्ज जोड़े जाते हैं। कई मामलों में तो सामान्य बीमारियों में भी जटिल ऑपरेशनों के बिल पास कराने का खेल सामने आया है।