नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक में विधान परिषद (एमएलसी) की 28 सीटों पर हुए द्विवार्षिक चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ एक सीट पर जीत मिली है। हालांकि, यह प्रदर्शन बेहद खराब माना जा रहा है, लेकिन महाराष्ट्र की नागपुर ग्रेजुएट्स सीट पर मिली जीत ने पार्टी को पूरी तरह खाली हाथ रहने से बचा लिया।इन चुनावों में कांग्रेस का जीत प्रतिशत महज 3.57 फीसदी रहा, जबकि उसके कई क्षेत्रीय सहयोगी दल उससे बेहतर प्रदर्शन करने में सफल रहे।
कांग्रेस की एकमात्र जीत महाराष्ट्र के नागपुर ग्रेजुएट्स निर्वाचन क्षेत्र से आई, जहां अभिजीत वांजारी ने सीट बरकरार रखी। इस जीत से पहले पार्टी के पूरी तरह साफ हो जाने की आशंका जताई जा रही थी। भाजपा के कई नेताओं ने कांग्रेस के संभावित 'शून्य प्रदर्शन' को लेकर सोशल मीडिया पर तंज कसा था।
अब कांग्रेस यह दावा कर सकती है कि उसके पास अभी भी कुछ क्षेत्रों में समर्थन आधार बना हुआ है और नागपुर उसका एक मजबूत गढ़ बना हुआ है।
कर्नाटक सत्ता में होने के बावजूद कांग्रेस को निराशा हाथ लगी। विशेष रूप से बेंगलुरु टीचर्स सीट पर हार पार्टी के लिए बड़ा झटका मानी जा रही है।
यहां जनता दल (सेक्युलर) के उम्मीदवार ए.पी. रंगनाथ ने कांग्रेस के मौजूदा एमएलसी पुट्टन्ना को करीब 900 वोटों से हरा दिया। राजधानी क्षेत्र की यह सीट कांग्रेस के लिए काफी महत्वपूर्ण मानी जाती थी।
बिहार के दरभंगा टीचर्स सीट पर भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। कांग्रेस उम्मीदवार मदन मोहन झा, जो दो बार इस सीट से जीत चुके थे और मौजूदा एमएलसी थे, उन्हें प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार सुरेश प्रसाद राय ने कड़े मुकाबले में हरा दिया।
रिपोर्टों के अनुसार, इंडिया गठबंधन के वोटों में बंटवारा भी हुआ क्योंकि लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद ने भी अपना उम्मीदवार उतारा था। इससे कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक को नुकसान पहुंचा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि नागपुर सीट भी कांग्रेस हार जाती तो यह उसके लिए और बड़ा राजनीतिक झटका होता। हाल के वर्षों में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में लगातार कमजोर प्रदर्शन के बाद यह हार पार्टी की मुश्किलें और बढ़ा सकती थी।
कांग्रेस अब इस एक जीत के आधार पर यह कह सकती है कि चुनाव नतीजे पूरी तरह एकतरफा नहीं रहे और कुछ क्षेत्रों में उसका प्रभाव अब भी मौजूद है।
पार्टी नेताओं का कहना है कि नागपुर जैसी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सीट पर जीत मिलने से कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं का मनोबल बढ़ेगा। साथ ही कांग्रेस यह भी दावा कर सकती है कि शिक्षित और स्नातक मतदाताओं के एक वर्ग में उसका प्रभाव अब भी कायम है।
इन चुनावों के नतीजों ने एक बार फिर विपक्षी खेमे में कांग्रेस की सीमित भूमिका को उजागर किया है। बिहार में राजद, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और महाराष्ट्र में एनसीपी (शरद पवार गुट) तथा शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट) जैसे दल अधिक प्रभावी नजर आए।
कुल मिलाकर, कांग्रेस को नागपुर से मिली एकमात्र जीत ने उसे राजनीतिक रूप से कुछ राहत जरूर दी है, लेकिन व्यापक तस्वीर यही दिखाती है कि एमएलसी चुनावों में भाजपा और उसके सहयोगी दलों का प्रदर्शन कहीं अधिक मजबूत रहा।














