भोपाल। मध्य प्रदेश सरकार की नगरीय विकास एवं आवास राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के अनुसूचित जाति (SC) प्रमाणपत्र की वैधानिकता को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद में एक बड़ा निर्णय सामने आया है। मामले की जांच कर रही राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी को क्लीन चिट दे दी है [cite: फर्जी एससी जाति प्रमाणपत्र के आरोप झेल रही प्रदेश सरकार की नगरीय विकास एवं आवास राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के मामले को देख रही राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने क्लीन चिट दे दी है।

समिति ने सभी दस्तावेजों और साक्ष्यों का सूक्ष्म परीक्षण करने के बाद उनके प्रमाणपत्र को पूरी तरह वैध और अनुसूचित जाति का ही माना है। इसके साथ ही समिति ने इस मामले में कांग्रेस द्वारा लगाए गए सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। दूसरी तरफ, कांग्रेस ने छानबीन समिति के इस फैसले को पूरी तरह गलत और दोषपूर्ण ठहराते हुए मामले को हाई कोर्ट (उच्च न्यायालय) ले जाने का बड़ा ऐलान कर दिया है।

कांग्रेस का गंभीर आरोप: 'प्रतिमा बागरी राजपूत समाज से हैं

दरअसल, इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब मध्य प्रदेश कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाणपत्र की वैधानिकता पर सीधे तौर पर गंभीर सवाल उठाए। प्रदीप अहिरवार का दावा है कि प्रतिमा बागरी अनुसूचित जाति (SC) वर्ग से ताल्लुक नहीं रखती हैं, बल्कि वे मूल रूप से राजपूत समाज यानी सामान्य वर्ग (General Category) से आती हैं और उन्होंने कूटरचित व फर्जी तरीके से यह जाति प्रमाणपत्र बनवाया है. कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि प्रतिमा बागरी ने इसी फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट से विधानसभा का चुनाव लड़ा और अनुचित तरीके से जीत हासिल कर मंत्री पद प्राप्त किया है।

6 जुलाई को पेश किए 110 साल पुराने दस्तावेजी प्रमाण, जिसके आधार पर मिली क्लीन चिट

कांग्रेस की इस आधिकारिक शिकायत के बाद राज्य सरकार ने मामले की तह तक जाने के लिए राज्य स्तरीय छानबीन समिति का गठन किया था, जिसने मामले से जुड़े तमाम दस्तावेज और साक्ष्य जुटाए थे। पिछले दिनों इस समिति ने राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी को निर्देश दिए थे कि वे स्वयं के अनुसूचित जाति के होने से संबंधित पुख्ता दस्तावेजी प्रमाणों के साथ 6 जुलाई को अनुसूचित जाति विकास आयुक्त कार्यालय में व्यक्तिगत रूप से पेश हों।

कार्यालय में पेश होकर राज्य मंत्री बागरी ने समिति के समक्ष अपने दावे के समर्थन में 110 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक खसरा-खतौनी की नकलें और राजस्व रिकॉर्ड प्रस्तुत किए। इन 110 साल पुराने दस्तावेजों में प्रतिमा बागरी के परिवार को कहीं भी राजपूत नहीं दर्शाया गया था और न ही किसी अन्य उपजाति का कोई उल्लेख था। इन अकाट्य ऐतिहासिक साक्ष्यों को सही पाते हुए समिति ने उनके जाति प्रमाणपत्र को वैध मानते हुए उन्हें मामले से पूरी तरह बरी (क्लीन चिट) कर दिया।

प्रतिमा बागरी ने कांग्रेस को घेरा: 'आपके दल ने भी गुनौर से बागरी समाज को बनाया है प्रत्याशी'

सुनवाई के दौरान राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी ने कांग्रेस के आरोपों पर पलटवार करते हुए समिति को अवगत कराया कि कांग्रेस स्वयं भी बागरी समाज को अनुसूचित जाति वर्ग का मानती आई है। उन्होंने तर्क दिया कि कांग्रेस द्वारा खुद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित पन्ना जिले की गुनौर विधानसभा सीट से महेंद्र बागरी और काशी बागरी को अपना आधिकारिक प्रत्याशी बनाया जा चुका है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि सतना जिले की रैगांव विधानसभा सीट (जहां से प्रतिमा बागरी वर्तमान में विधायक हैं) से उनके दादा जुगल किशोर बागरी भी लंबे समय तक विधायक रहे हैं, जिनका जुड़ाव हमेशा अनुसूचित जाति वर्ग से रहा है।

कांग्रेस का पलटवार: 'सौंपे थे 430 पन्नों के प्रमाण

छानबीन समिति द्वारा शिकायत को खारिज किए जाने के बाद शिकायतकर्ता और कांग्रेस नेता प्रदीप अहिरवार ने समिति की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने बताया कि उन्होंने समिति को पूरे 430 पन्नों के पुख्ता दस्तावेज सौंपे थे, जिनमें स्पष्ट रूप से बागरी जाति के रहन-सहन और देश के अन्य विभिन्न राज्यों में इस जाति के सामान्य वर्ग (General) में होने का स्पष्ट उल्लेख था, लेकिन समिति ने बिना उन पर विचार किए उनके तर्कों को एकतरफा खारिज कर दिया।