नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) आज यानी बुधवार को अपनी द्विमासिक समीक्षा बैठक के फैसलों की घोषणा करेगी। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता वाली छह सदस्यीय समिति ऐसे समय में अपना निर्णय सुनाएगी जब देश और दुनिया दोनों स्तरों पर महंगाई तथा ऊर्जा कीमतों को लेकर चिंताएं बढ़ी हुई हैं।यह बैठक बढ़ती खुदरा महंगाई, 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने कच्चे तेल के दाम और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव की पृष्ठभूमि में हो रही है। इन परिस्थितियों ने वित्तीय बाजारों और नीति निर्माताओं दोनों का ध्यान आकर्षित किया है।
हालांकि आरबीआई ने पिछली समीक्षा में रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रखा था, लेकिन इस बार कई अर्थशास्त्री और बाजार विशेषज्ञ ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना जता रहे हैं। फरवरी 2023 के बाद यह पहली दर बढ़ोतरी हो सकती है।
बैंक ऑफ अमेरिका (बोफा) का मानना है कि दिसंबर तक इंतजार करने के बजाय अक्टूबर की बैठक में ही 25 आधार अंकों (0.25 प्रतिशत) की बढ़ोतरी की जा सकती है। संस्था के अनुसार, लगभग दो वर्षों की मौद्रिक सहजता के बाद अब आरबीआई नीतिगत समर्थन को धीरे-धीरे वापस लेने की दिशा में कदम उठा सकता है।
इसी तरह एसबीआई रिसर्च ने भी कहा है कि बढ़ते मुद्रास्फीति दबाव, कमजोर होती वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, बदलती तरलता स्थिति और वैश्विक जोखिमों के दोबारा मूल्यांकन को देखते हुए इस समय 25 आधार अंकों की दर वृद्धि का मामला मजबूत दिखाई देता है।
एसबीआई रिसर्च के अर्थशास्त्रियों का कहना है कि परिस्थितियों को देखते हुए बाद में कार्रवाई करने के बजाय पहले से कदम उठाना अधिक विवेकपूर्ण होगा।
महंगाई के मोर्चे पर भी चिंता बढ़ी है। अगस्त में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित महंगाई बढ़कर 4.82 प्रतिशत पहुंच गई, जो जुलाई में 4.45 प्रतिशत थी। इसके अलावा मजबूत अल नीनो प्रभाव और अक्टूबर में सामान्य से कम बारिश की आशंका रबी फसलों के उत्पादन पर असर डाल सकती है, जिससे खाद्य महंगाई का जोखिम बढ़ सकता है।
इस बीच, वैश्विक स्तर पर बढ़ती बॉन्ड यील्ड और ऊंची ऊर्जा कीमतों ने भी आरबीआई के लिए ब्याज दरों को लंबे समय तक अपरिवर्तित रखना कठिन बना दिया है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्रीय बैंक को महंगाई नियंत्रण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाकर निर्णय लेना होगा।
निवेशकों, उद्योग जगत और कर्ज लेने वालों की नजर अब आरबीआई के रेपो रेट फैसले के साथ-साथ उसके महंगाई अनुमान, आर्थिक वृद्धि के आकलन और भविष्य की नीति रुख पर भी रहेगी। यही संकेत आने वाले महीनों में बाजारों और ब्याज दरों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।












