श्रीनगर, 17 मई । 36 साल बाद रविवार को विस्थापित कश्मीरी पंडित जम्मू-कश्मीर के बांदीपोरा जिले में 'सुंबली मावस' उत्सव मनाने के लिए आए।दशकों बाद, बड़ी संख्या में विस्थापित कश्मीरी पंडित बांदीपोरा के सुंबल इलाके में स्थित ऐतिहासिक नंद किशोर मंदिर में तीन दिनों तक चलने वाला 'सुंबली मावस' उत्सव मनाने के लिए आए।

यह उत्सव कश्मीरी पंडित संत, महाराज नंद किशोर की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है, जिसमें देश के अलग-अलग हिस्सों से आए विस्थापित पंडित शामिल हो रहे हैं।

सुंबल इलाके को विस्थापित पंडितों के लिए अपनी जड़ों से दोबारा जुड़ने का एक सुनहरा अवसर माना जाता है। जब ये पंडित अपने पुराने पड़ोसियों से मिले, तो धर्म और राजनीति की सारी दीवारें जैसे ढह गईं। मुस्लिम और पंडित, दोनों ही एक-दूसरे से मिलकर रो पड़े।

कई जाने-माने कश्मीरी पंडित परिवारों की सुंबल इलाके में अपनी जमीनें थीं, जिनमें से ज्यादातर पर सेब के बाग लगे हुए थे। समय बीतने के साथ, जमीन के इन बड़े-बड़े टुकड़ों पर अब घर और दुकानें बन गई हैं। ज्यादातर कश्मीरी पंडित परिवारों को अपनी पुश्तैनी जमीन-जायदाद मजबूरी में बेचनी पड़ी, जबकि कई मामलों में, घाटी में हिंसा के दौरान इन जमीनों पर अवैध रूप से कब्जा कर लिया गया था।

प्रशासन ने इस उत्सव को शांतिपूर्ण और सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए सुरक्षा और प्रशासनिक स्तर पर व्यापक इंतजाम किए हैं। बांदीपोरा की डिप्टी कमिश्नर इंदु कंवल चिब ने मंदिर का दौरा किया और विशेष प्रार्थनाओं में हिस्सा लिया।

वहीं, बांदीपोरा के सीनियर सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस ने उत्सव शुरू होने से पहले सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया।

बता दें कि जबरदस्ती विस्थापन के गहरे जख्म कश्मीरी पंडितों के दिलों और दिमागों में आज भी ताजा हैं। 1990 के दशक की शुरुआत में इस दुख और तकलीफ को बुज़ुर्गों ने सबसे ज्यादा महसूस किया था। जब घाटी पर पाकिस्तान-समर्थित आतंकवाद का साया मंडराने लगा, तो इस समुदाय को अपना घर-बार छोड़कर भागने पर मजबूर होना पड़ा।

कश्मीरी पंडितों को घर, जमीन और दूसरी संपत्तियों को छोड़कर जम्मू और देश के अन्य हिस्सों में शरण लेने के लिए विवश होना पड़ा। उनमें से ज्यादातर लोग आज तक वापस नहीं लौट पाए हैं।

बांदीपोरा का सुंबल इलाका इस समय एक बेहद भावुक और दिल को छू लेने वाले पल का गवाह बन रहा है, जहां इस विशेष अवसर पर समुदाय के कुछ सदस्य एक साथ इकट्ठा हुए हैं।