सतना, सजल कुमार रजक। शहर को स्मार्ट बनाने की दिशा में चलाई गई स्मार्ट सिटी परियोजना के अंतर्गत शहर के तीन प्रमुख क्षेत्रों में लगभग 10 किलोमीटर लंबा साइकिल ट्रैक तैयार किया गया था। इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर कुल 5.51 करोड़ रुपये की बड़ी राशि खर्च की गई थी। तीन मीटर चौड़े इस ट्रैक का निर्माण इसलिए किया गया था ताकि लोग सुरक्षित तरीके से साइकिल चला सकें। लेकिन वर्तमान में इस ट्रैक की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है और यहां साइकिलों की बजाय अनधिकृत कब्जों का बोलबाला है।
पन्ना रोड से सोहावल मोड़ तक सबसे खराब हालात
इस पूरे प्रोजेक्ट के तहत पन्ना रोड से सोहावल मोड़ तक बनाए गए साइकिल ट्रैक की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक बनी हुई है। इस मार्ग पर अतिक्रमणकारियों और वाहन चालकों ने पूरी तरह कब्जा जमा लिया है। ट्रैक के बीचों-बीच दोपहिया और चारपहिया वाहन पार्क किए जा रहे हैं, तो वहीं कई जगहों पर भवन निर्माण से जुड़ी सामग्री जैसे रेत आदि डंप की जा रही है। इसके अलावा, शॉपिंग मॉल की ट्रॉलियां भी इसी ट्रैक पर इधर-उधर बिखरी रहती हैं, जिससे साइकिल चलाना तो दूर, आम राहगीरों का निकलना भी मुश्किल हो गया है।
क्या था इस योजना का मूल उद्देश्य?
प्रशासन द्वारा इस महंगे प्रोजेक्ट को शुरू करने के पीछे कई बड़े और दूरदर्शी उद्देश्य तय किए गए थे। इसके तहत शहर के साइकिल चालकों को एक सुरक्षित, सुगम और अलग रास्ता उपलब्ध कराना मुख्य प्राथमिकता थी ताकि सड़कों पर बढ़ते यातायात के दबाव को कम किया जा सके। इसके साथ ही, पर्यावरण के अनुकूल परिवहन माध्यमों को बढ़ावा देकर शहर को प्रदूषण मुक्त बनाना भी इस योजना का प्रमुख लक्ष्य था। लेकिन धरातल पर फैली व्यवस्थाएं इन सभी उद्देश्यों की पोल खोल रही हैं।
सरकारी धन के सदुपयोग पर उठ रहे बड़े सवाल
करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी यदि किसी योजना का लाभ आम जनता तक न पहुंचे, तो उसकी उपयोगिता पर सवाल उठना लाजिमी है। सतना के इस साइकिल ट्रैक के मामले में भी अब यही सवाल शहर के हर नागरिक की जुबान पर है कि आखिर इतनी भारी-भरकम राशि खर्च करने का क्या औचित्य था? क्या संबंधित विभाग और जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी कभी इस ट्रैक को अतिक्रमण मुक्त करवाकर इसे साइकिल सवारों के लिए उपयोगी बना पाएंगे, या फिर यह योजना भी सरकारी धन की बर्बादी का एक और जीवंत उदाहरण बनकर रह जाएगी?

















